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संपादकीय: कठिन डगर

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और रेटिंग एजेंसियों के जो अनुमान आए हैं, वे भविष्य की मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं। कुछ रेटिंग एजेंसियां तो अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ्तार बहुत ही धीमी रहने तक की भविष्यवाणी करती रही हैं।

Author Updated: January 28, 2021 4:18 AM
Reserve Bankसांकेतिक फोटो।

हालांकि पिछले हफ्ते भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्ति कांत दास ने भरोसा दिलाया कि अर्थव्यवस्था अब महामारी के दौर से बाहर निकल चुकी है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पटरी पर लौटने के करीब है। अब दो दिन पूर्व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने न सिर्फ इस साल आर्थिक विकास की दर साढ़े ग्यारह फीसद रहने का अनुमान व्यक्त किया, बल्कि यह भी जोड़ा कि इस दौर में भारत अकेला बड़ी अर्थव्यवस्था है जो दो अंकों की विकास दर हासिल करने की ओर बढ़ रहा है।

मुद्रा कोष और रिजर्व बैंक का ऐसा उम्मीदों भरा आकलन बता रहा है कि यह साल अच्छा रहेगा। देखा जाए तो ये सब अनुमान ही हैं। असल बात तो यह है कि अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए जो लक्ष्य तय किए गए हैं, उन्हें हम कितना हासिल कर पाते हैं, काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा।

अर्थव्यवस्था के दुरुस्त होने का पहला संकेत तो आरबीआइ ने यह दिया है कि अब घरेलू खर्च तेजी से सामान्य स्थिति में लौट रहा है। जाहिर है, कारोबारी गतिविधियां जोर पकड़ रही हैं, लोगों को रोजगार मिलना शुरू हुआ है और लोगों के हाथ में पैसे की आवक शुरू होने लगी है। यही वजह है कि अब बाजारों में अब मांग भी दिखने लगी है।

पूर्णबंदी के कारण देश में जो सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया था, वह यही था कि छोटे-बड़े उद्योग सब बंद हो जाने से करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए थे और मांग-आपूर्ति का चक्र टूट गया था। हालांकि अभी भी यह स्थिति पूरी तरह से काबू में आने में लंबा वक्त लगेगा, लेकिन शुरुआत हो चुकी है। इसका एक संकेत यह भी है कि दिसंबर में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का संग्रह एक लाख पंद्रह हजार करोड़ तक पहुंच गया था।

औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में सुधार के संकेत मिलने तो शुरू हो गए हैं, लेकिन ये उम्मीदों के मुताबिक परिणाम नहीं दे रहे हैं। कहने को केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में चार राहत पैकेज भी दिए, लेकिन ये नाकाफी हैं। अर्थव्यवस्था को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उद्योगों खासतौर से सूक्ष्म, छोटे और मझौले (एमएसएमई) को और मदद की जरूरत है। जब तक यह क्षेत्र नहीं उठेगा, तब तक तेज आर्थिक वृद्धि दर की उम्मीद नहीं की जा सकती।

बजट आने में हफ्ता भर भी नहीं रह गया है। हर क्षेत्र इसी उम्मीद में है कि उसके लिए बजट में कुछ न कुछ ऐसा होगा जिससे आगामी वित्त वर्ष में संकट भरे हालात से निजात मिल सके। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत का संकल्प भी किया है। जाहिर है, बजट प्रावधान और नीतियां घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने वाले होंगे।

इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि बजट में उद्योग और कृषि क्षेत्र पर खास जोर हो सकता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए इन दोनों ही क्षेत्रों में भारी निवेश की जरूरत है। इसी से रोजगार और निर्यात के रास्ते भी खुलेंगे। बाजार में मांग और खपत का चक्र भी तभी जोर पकड़ेगा जब लोगों के हाथ में पैसा आएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस बार का बजट आम आदमी को भले कोई राहत न दे, लेकिन जोर अर्थव्यवस्था को मंदी के दुश्चक्र से बाहर निकालने के प्रयासों पर केंद्रित होगा।

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