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संपादकीयः लापरवाही का इतिहास

दिल्ली में मंडी हाउस स्थित राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में आग लगने से वहां रखी तमाम वस्तुओं का खाक हो जाना देश की एक बहुत बड़ी क्षति है।

Author April 28, 2016 2:53 AM
Ficci बिल्डिंग में आग

दिल्ली में मंडी हाउस स्थित राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में आग लगने से वहां रखी तमाम वस्तुओं का खाक हो जाना देश की एक बहुत बड़ी क्षति है। यह ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई शायद संभव नहीं है। संग्रहालय में आग किस वजह से लगी यह फिलहाल साफ नहीं है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक एसी या किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में शार्ट सर्किट के कारण आग लगी होगी। वजह जो भी रही हो, इसे सिर्फ दुर्घटना कह कर मामले को रफा-दफा नहीं किया जा सकता। अब तक की छानबीन से जो तथ्य सामने आए हैं उनके मुताबिक संग्रहालय में आग से बचाव के आधे-अधूरे इंतजाम ही थे।

जो उपकरण लगे भी थे वे काम नहीं कर रहे थे। अगर आग लगने की सूरत में आपातकालीन प्रबंध आंशिक रूप से भी काम कर रहा होता, तो आग पर और पहले काबू पा लिया जाता, और तब संग्रहालय को नुकसान कम होता। मौके पर पहुंचे अग्निशमन दस्ते ने पूरी जांबाजी का परिचय दिया। सोमवार को देर रात में लगी इस आग से संग्रहालय की तमाम बहुमूल्य चीजें खाक हो गर्इं। प्राकृतिक इतिहास से परिचित कराने और पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के मकसद से 1972 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संग्रहालय स्थापित करने की घोषणा की थी। राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय जून 1978 में आम नागरिकों के लिए खोल दिया गया।

यहां बहुत-से दुर्लभ और लुप्त हो चुके जीव-जंतुओं के जीवाश्म, उनकी खाल आदि से उनके मूल स्वरूप के तैयार किए गए नमूने और हजारों दस्तावेज व शोधपत्र थे। यहां प्राकृतिक इतिहास की कई ऐसी निशानियां थीं जो दुनिया के किसी और संग्रहालय में नहीं हैं। डायनासोर की भारतीय प्रजाति के कंकाल और अंडे, सफेद बाघ की खाल से बनाए गए उसके मूल स्वरूप के नमूने, कई दुर्लभ पशु-पक्षियों के जीवाश्म तथा नमूने यहां देखने को मिलते थे।

जाहिर है, यह रोमांच, कौतुक, जी बहलाव और ज्ञानवर्धन का भी एक केंद्र था। दूर-दूर से सैलानी और विद्यार्थी यहां खिंचे आते थे। शोधार्थी और अध्येता भी। ऐसा संस्थान केवल आर्थिक संसाधन से निर्मित नहीं होता। जिस लगन, श्रम और मेधा ने संग्रहालय को मूर्त रूप दिया था उसकी कल्पना ही की जा सकती है। संग्रहालय को प्रगति मैदान में स्थानांतरित करने की योजना पर काम चल रहा था कि यह हादसा हो गया। अब प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय जहां भी होगा, अपना मूल स्वरूप काफी हद चुका खो चुका होगा। जिन अवशेषों से नमूने तैयार किए गए थे, वे अवशेष अब कहां मिलेंगे!

सवाल है अपनी धरोहरों के रखरखाव और उनकी सुरक्षा को लेकर हम कितने संजीदा हैं? लापरवाही का सिलसिला कब तक चलेगा? ऐसे अनूठे संग्रहालय में एक भी फायर सिस्टम का काम न करना हैरतनाक मामला है। हमारे संग्रहालयों की क्या दशा है इसे सूचित करने वाली एक और खबर इसी समय आई। दिल्ली में नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय से एक कटार चोरी चली गई जिस पर सोने की परत चढ़ी थी। यह कटार प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सऊदी अरब ने उपहार में दी थी। खबर है कि जहां से कटार चोरी हुई वहां के परिसर में सीसीटीवी कैमरे नहीं हैं। संग्रहालयों से चोरी के कई और वाकये बताए जा सकते हैं। कलाकृतियों तथा दुर्लभ वस्तुओं की तस्करी के तार बहुत दूर-दूर तक फैले हुए हैं। पर धरोहरों के अतिक्रमण का शिकार होने के भी ढेरों मामले हैं। इस सब पर रोक कब लगेगी!

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