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संपादकीय: संकट और राहत

छोटे और बड़े उद्योगों के सामने संकट कर्मचारियों को बंदी के दौरान वेतन देने का तो है ही, इसके साथ ही बैंक कर्ज की मासिक किस्तें चुकाने का भी है। उद्योगों के समक्ष वैसे ही कई तरह के दबाव हैं, जिनसे वे जूझ रहे हैं। हालांकि कोरोना संकट के दौरान उद्योगों को राहत के मुद्दे पर प्रधानमंत्री उद्योगपतियों से बात कर चुके हैं।

संपादकीयवित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार आर्थिक पैकेज के ऐलान पर विचार कर रही है।

देश में कोरोना महामारी के बीच मंगलवार को वित्तमंत्री ने जो कुछ घोषणाएं की, उनसे कारोबारियों और बैंक खाताधारकों को थोड़ी तो राहत मिलेगी। वित्त वर्ष समाप्ति की ओर है और कंपनियों को अपने कर समय से चुकाने हैं। लेकिन पूर्ण बंदी के कारण सारे काम ठप हैं। ऐसे में कारोबारी चिंतित हैं। अब कारोबारी मार्च-मई की जीएसटी रिटर्न 30 जून तक दाखिल कर सकेंगे। जिन कंपनियों का कारोबार पांच करोड़ रुपए तक है, उन्हें रिटर्न दाखिल करने में देरी हो जाने पर कोई विलंब शुल्क, जुर्माना या ब्याज नहीं देना पड़ेगा।

जिन कंपनियों का कारोबार पांच करोड़ रुपए से ज्यादा है, उन्हें पंद्रह दिन की छूट मिलेगी और इस अवधि में जीएसटी रिटर्न दाखिल करने पर कोई विलंब शुल्क या जुर्माना नहीं लिया जाएगा। उसके बाद अगर देरी हुई तो बारह के बजाय नौ फीसद की दर से ब्याज लिया जाएगा। इसी तरह टीडीएस जमा करने में देरी पर अठारह की जगह नौ फीसद ब्याज लिया जाएगा। कारोबारियों पर नियत अवधि में कर जमा करने का जो दबाव रहता है, उसमें यह थोड़ी राहत जरूर है। इसी तरह बैंक खाताधारकों के लिए न्यूनतम शेष राशि और डेबिट कार्ड तथा एटीएम पर लगने वाले शुल्क भी फिलहाल खत्म कर दिए गए हैं।

भारत में कोरोना महामारी जिस तेजी से फैल रही है, उसका अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ना स्वाभाविक है। इसे रोकने के लिए देशभर में पूर्ण बंदी लागू कर दी गई है। औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन बंद है। दवा और किराना दुकानों को छोड़ कर बाजार पूरी तरह से बंद हैं। जाहिर है, अर्थतंत्र के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है। अभी कारोबारियों की सबसे बड़ी चिंता यह बनी हुई है कि कब हालात सुधरेंगे और काम-धंधा शुरू होगा। किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि कोरोना वायरस फैलने से रोकने के लिए सरकार को पूर्ण बंदी जैसा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

सबसे ज्यादा असर उन छोटे और मझोले कारोबार पर पड़ा है, जो छोटी पूंजी से चलते हैं और अचानक काम बंद होने से उन्हें अगले महीने अपने कर्मचारियों को वेतन देने का संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने साफ कह दिया है कि इस बंदी के दौरान कोई भी संस्थान किसी भी कर्मचारी का वेतन और छुट्टी न काटे और उसे काम पर माना जाए। ऐसे में उद्योगों का संकट अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।

छोटे और बड़े उद्योगों के सामने संकट कर्मचारियों को बंदी के दौरान वेतन देने का तो है ही, इसके साथ ही बैंक कर्ज की मासिक किस्तें चुकाने का भी है। उद्योगों के समक्ष वैसे ही कई तरह के दबाव हैं, जिनसे वे जूझ रहे हैं। हालांकि कोरोना संकट के दौरान उद्योगों को राहत के मुद्दे पर प्रधानमंत्री उद्योगपतियों से बात कर चुके हैं।

इसलिए यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार जल्द ही प्रभावित क्षेत्रों के लिए घोषणाएं कर सकती है। रियल एस्टेट जैसे कुछ क्षेत्र, जो लंबे समय से मंदी की मार झेल रहे हैं, अब कोरोना संकट के कारण और ज्यादा प्रभावित होंगे। इसके अलावा कंपनियों में उत्पादन बंद होने से चौथी तिमाही के नतीजे भी निराशाजनक रहेंगे और इसका असर जीडीपी की वृद्धि पर पड़ेगा, जो पहले से ही काफी कम है। इस वक्त पहली प्राथमिकता कोरोना से निपटने की है, लेकिन अचानक बंदी से जो संकट खड़ा होगा, वह भी कम गंभीर नहीं है।

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