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पाइरेसी का जाल

फिल्म उद्योग से जुड़े लोग साहित्यिक चोरी और पाइरेसी के खिलाफ लंबे समय से आवाज उठा रहे हैं। इस संबंध में एक सख्त कानून और उस पर प्रभावी अमल को लेकर भी लगातार बातें होती रही है..

Author नई दिल्ली | December 9, 2015 10:41 PM

फिल्म उद्योग से जुड़े लोग साहित्यिक चोरी और पाइरेसी के खिलाफ लंबे समय से आवाज उठा रहे हैं। इस संबंध में एक सख्त कानून और उस पर प्रभावी अमल को लेकर भी लगातार बातें होती रही हैं और विभिन्न पक्षों के बीच आमतौर पर सहमति रही है कि पाइरेसी न सिर्फ साहित्यिक चोरी का मामला है, बल्कि इसके चलते फिल्म उद्योग को भारी घाटा उठाना पड़ता है। लेकिन पाइरेसी के असर और इससे संबंधित तमाम आंकड़े सामने होने के बावजूद सरकार की ओर से अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। यही वजह है कि तिरुवनंतपुरम में चल रहे केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में एक बार फिर यह स्वर उभरा है कि पाइरेसी और साहित्यिक चोरी से प्रभावी ढंग से निपटने वाला कानून लाने की तत्काल जरूरत है और केरल को इस मामले में पहल करनी चाहिए। महोत्सव के अंतर्गत ‘पाइरेसी और मूल रचना’ विषय पर आयोजित एक चर्चा-सत्र में पाइरेसी के खिलाफ कठोर कदम उठाने की मांग की गई। करीब साढ़े तीन साल पहले कॉपीराइट कानून में संशोधन करके गीतकार, संगीतकार, संवाद और पटकथा लेखक के स्वत्वाधिकार के संरक्षण के लिए नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया गया था। लेकिन सच यह है कि चूंकि नकली संगीत का कारोबार करने वाली कंपनियों के बारे में एक धुंधली स्थिति छोड़ दी गई थी, इसलिए इस कारोबार पर पूरी तरह लगाम लगाना मुमकिन नहीं हो सका। यह छिपा नहीं है कि पुराने गीतों को दूसरे किसी स्वर में रिकार्ड करके या उसके संगीत में मामूली फेरबदल कर धड़ल्ले से कैसेट, सीडी आदि बेचे जाते रहे हैं। इस तरह की सीडी तैयार करने से पहले आमतौर पर मूल रचना के स्वत्वाधिकारियों से इजाजत लेना भी जरूरी नहीं समझा जाता।

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आज स्थिति और ज्यादा जटिल हो चुकी है, जिसमें इंटरनेट के जरिए पाइरेसी की समस्या ज्यादा बड़ी मुश्किल साबित हो रही है। इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों वेबसाइट हैं जहां से किसी भी गीत-संगीत या फिल्म की नकली प्रति डाउनलोड कर ली जाती है या फिर उसकी फाइल लोगों को कम कीमत पर बेची जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक फिल्म उद्योग को हर साल पाइरेसी की वजह से करीब छियानबे करोड़ डॉलर और सॉफ्टवेयर उद्योग को सालाना दस अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। सबसे ज्यादा असर संगीत उद्योग पर पड़ रहा है और यह क्षेत्र अपनी केवल दस प्रतिशत रचनाओं का आर्थिक लाभ उठा पाता है। बाकी की नब्बे प्रतिशत रचनाएं पाइरेसी की दुनिया में खप जाती हैं। भारत को आॅनलाइन पाइरेसी का एक बड़ा अड्डा भी माना जाता है और यहां अवैध रूप से यह काम करने में दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू सबसे आगे हैं। हालांकि गैरकानूनी रूप से फिल्म डाउनलोड करने के मामले में भारत दुनिया भर में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बाद चौथे नंबर पर है। यह भी देखा गया है कि किसी मौके पर इस अवैध स्रोत पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन की सक्रियता बढ़ती है और प्रतिबंध लगाए जाते हैं तब वैध स्रोतों से संगीत सुनने और डाउनलोड करने की गति बढ़ जाती है। यानी अगर पाइरेसी के खिलाफ ठोस नियम हों और उन पर सख्ती से अमल सुनिश्चित हो तो लोग भी इससे बचने की कोशिश करेंगे। साथ ही, इस मसले को सिर्फ सिनेमा से जुड़ी रचनात्मकता के संदर्भ में देखने के बजाय संपूर्ण बौद्धिक संपदा के दायरे में देखने की जरूरत है। े के लिए दबाव बनाता आ रहा है।

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