अमेरिका के न्यू जर्सी में स्पेन और अर्जेंटीना के बीच खेले गए फीफा के फाइनल मैच के साथ ही इस वर्ष का अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल आयोजन अपने पीछे खट्टी-मीठी यादें छोड़ गया है। फाइनल में स्पेन ने मैदान में शानदार प्रदर्शन करते हुए अर्जेंटीना को अतिरिक्त समय में एक गोल से हराया और फीफा विश्व कप 2026 अपने नाम कर लिया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि स्पेन और अर्जेंटीना ने अपना पूरा दम लगाकर एक-दूसरे से मुकाबला किया। निर्धारित समय में कोई फैसला नहीं हो सका, तो इसका मतलब यही है कि मैदान में दो बराबर क्षमता की टीमें थीं और यह तय होना मुश्किल था कि कौन दूसरे पर भारी पड़ेगा।
मगर अतिरिक्त समय में आखिर स्पेन ने बाजी झटककर यह साबित किया कि एक बार फिर वह फिलहाल सर्वश्रेष्ठ टीम है। हालांकि स्पेन ने दबदबा जरूर बनाए रखा, लेकिन अर्जेंटीना ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी। निश्चित तौर पर फुटबॉल से प्रेम करने वालों को लियोनेल मेस्सी के चमत्कारिक खेल की उम्मीद रही होगी, लेकिन फाइनल सहित पिछले कई मैचों में उनकी चमक फीकी ही रही।
दरअसल, एक खिलाड़ी की क्षमता पर ज्यादा निर्भरता किसी भी टीम के बाकी मोर्चे को सुरक्षात्मक बना दे सकती है। अर्जेंटीना के साथ शायद ऐसा ही हुआ। दूसरी ओर, स्पेन के सभी खिलाड़ियों ने पूरे मैदान में हर स्तर पर अपनी ठोस मौजूदगी का एहसास कराया और वैश्विक खिताब अपने नाम किया। जाहिर है, जिस अर्जेंटीना से वैश्विक फुटबॉल प्रेमियों को किसी चमत्कार की आस रही होगी, अब उसकी टीम की उम्मीदें अगले आयोजन तक के लिए आगे खिसक गईं। यह किसी भी खेल प्रतियोगिता का एक सामान्य और स्वाभाविक चक्र है।
मगर अफसोस की बात है कि फीफा के मैचों में जिस तरह लगातार कई विवाद सामने आए, उसने दुनिया भर के खेलप्रेमियों को निराश किया। कुछ मैचों के दौरान कई मौकों पर खिलाड़ियों ने जिस तरह नियमों को तोड़ने की कोशिश की, कई खिलाड़ियों के बीच अप्रिय टकराव की स्थिति देखी गई और रेफरी की भूमिका पर सवाल उठे, उससे प्रतियोगिता के नियम-कायदे और उन पर सख्ती से अमल को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं।
