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संपादकीय: बाइडेन की चुनौतियां

अमेरिका के छियालिसवें राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ऐसे वक्त में सत्ता की कमान संभाली है जब देश गंभीर संकटों का सामना कर रहा है। चाहे अमेरिका के अंदरूनी हालात हों या वैश्विक राजनीति का बदलता परिदृश्य, बाइडेन के लिए सब कुछ बहुत आसान नहीं कहा जा सकता।

Author Updated: January 21, 2021 6:25 AM
joe bidenअमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन। फाइल फोटो।

अमेरिका के इतिहास में ऐसे मौके कम ही आए हैं जब हिंसा, तनाव, कर्फ्यू जैसे माहौल में अभेद्य सुरक्षा के बीच राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण समारोह हुआ। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सुरक्षा व्यवस्था में लगे हर शख्स पर कड़ी निगरानी रही, ताकि कहीं कोई सुरक्षाकर्मी बाइडेन के शपथ ग्रहण समारोह में हमला न कर दे।

ऐसा पहले कभी देखने में नहीं आया जब अमेरिका में अपने ही लोगों खासतौर से सुरक्षा में लगे जवानों को भी इतने संदेह से देखा गया हो। पिछले दो महीने के दौरान अमेरिका में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिलीं, वे स्तब्ध कर देने वाली हैं। क्या कोई कभी यह सोच सकता था कि चुनाव हार जाने के बाद एक राष्ट्रपति चुनाव नतीजों को पलटवाने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपना सकता है, अपने समर्थकों से उत्पात करवा सकता है और हथियारों से लैस उसके समर्थकों की फौज देश की सर्वोच्च विधायी संस्था को निशाना बना सकती है!

हाल की घटनाओं ने दुनिया में अमेरिका की छवि धूमिल की है। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिकी समाज जिस तरह से बंटा है और नस्लवाद की खाई चौड़ी हुई है, अमेरिका के लिए इसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। जो देश दुनिया को लोकतंत्र, समानता, मानवाधिकार जैसे उपदेश देता है, उसी देश में अश्वेतों को किस तरह से निशाना बनाया जा रहा है, यह दुनिया देख रही है।

ऐसे में बाइडेन के समक्ष घरेलू मोर्चे पर बड़ी चुनौती अश्वेत समुदाय के प्रति पनप रही घृणा को खत्म करना है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका के निर्माण में अश्वेतों की भूमिका श्वेतों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी रही है। पिछले एक साल में कोरोना महामारी ने अमेरिका को हर तरह से तोड़ कर रख दिया है। कोरोना से निपटने में ट्रंप ने जिस तरह का लापरवाही भरा रवैया दिखाया, उसका खमियाजा अमेरिकी आज भुगत रहे हैं। अर्थव्यवस्था चौपट हाल में है, बेरोजगारी चरम पर है और अमेरिकी उद्योग-धंधे संरक्षण मांग रहे हैं।

राष्ट्रवाद के नाम पर ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका को जिस तरह बर्बाद किया है, उससे पार पाना बाइडेन के लिए आसान नहीं होगा। वैश्विक मोर्चे पर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे संकट भी बाइडेन को विरासत में मिले हैं। अगर अमेरिका ने इन दोनों देशों के प्रति विवेकपूर्ण और तार्किक नीति नहीं अपनाई तो संकट और ज्यादा बढ़ेगा।

भारत को लेकर बाइडेन ने हालांकि सकारात्मक रुख ही दिखाया है। ट्रंप के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती आई थी, खासतौर से रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र कारोबारी समझौते हुए। तीन बड़े रक्षा करार भी हो चुके हैं और अरबों डॉलर के हथियार सौदे प्रक्रिया में हैं। हालांकि द्विपक्षीय व्यापार को लेकर समय-समय पर ट्रंप भारत को आंखें दिखाने से बाज नहीं आए और तरजीह व्यापार व्यवस्था से भारत को बाहर कर दिया।

इसलिए अब कारोबार और रणनीतिक समझौतों में बाइडेन प्रशासन का क्या रुख रहेगा, यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध उपराष्ट्रपति कमला हैरिस पहले ही कर चुकी हैं। जाहिर है, कश्मीर को लेकर अमेरिका और भारत के बीच संबंध सहज नहीं होंगे। बाइडेन को अमेरिका के हितों को सर्वोपरि रखते हुए आगे बढ़ना है, लेकिन चीन और रूस के साथ वे कैसे शक्ति संतुलन बना पाते हैं, यही उनके कौशल की परीक्षा भी होगी।

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