उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में कार्यरत एक बूथ स्तरीय अधिकारी की आत्महत्या की घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था और मानवीय मूल्यों एवं संवेदनशीलता को लेकर फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खबरों के मुताबिक, यह कर्मी अपनी बेटी की शादी के लिए छुट्टी नहीं मिलने से इस कदर परेशान था कि प्राथमिक विद्यालय के भवन में फंदा लगाकर अपनी जान दे दी।

विभिन्न राज्यों में पुनरीक्षण की प्रक्रिया में जुटे कर्मियों पर काम का दबाव होने की खबरें पहले भी आती रही हैं, लेकिन यह मामला सीधे तौर पर व्यवस्था में मनमानी, लापरवाही और असंवेदनशीलता से जुड़ा हुआ है।

यह बात सही है कि पुनरीक्षण के कार्य का दबाव विभागीय स्तर पर महसूस किया जा रहा है, लेकिन क्या काम की अत्यधिक व्यस्तता के नाम पर किसी कर्मी को अपनी अति महत्त्वपूर्ण पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने से रोका जा सकता है? वह भी ऐसी व्यवस्था में जहां कर्मचारियों के लिए वर्ष भर के अवकाश तय होते हैं!

गौरतलब है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अब तक उठे विवादों में एक मामला बूथ स्तरीय अधिकारियों पर काम के अत्यधिक दबाव का भी रहा है। इस कारण कई कर्मियों के आत्महत्या करने तथा दिल का दौरा पड़ने या अन्य स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से मौत हो जाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

अब काम पूरा करने की समयसीमा नजदीक आते ही बूथ स्तरीय अधिकारियों पर दबाव और बढ़ गया है और उन्हें आसानी से अवकाश भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में एक कर्मी के आत्महत्या कर लेने की यह घटना इसी ओर इशारा करती है। यह समझना भी जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति के लिए नौकरी का मतलब यही होता है कि वह अपने परिवार का ठीक से पालन-पोषण कर सके और पारिवारिक जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभा सके।

अगर बेटी या बेटे की शादी जैसे अत्यावश्यक कार्यों या आपात स्थिति में किसी कर्मी को छुट्टी ही न मिले, उस नौकरी के क्या मायने रह जाते हैं। बहरहाल, आत्महत्या की इस घटना की गहन जांच होनी चाहिए और दोषियों की जवाबदेही तय कर उन्हें कानून के कठघरे में लाया जाना चाहिए।