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संवेदनहीनता का रुख

किसानों की खुदकुशी की बाबत कृषिमंत्री राधामोहन सिंह के बयान पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। इस मुद्दे पर जनता दल (एकी) ने उनके खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे रखा है तो पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (एस) के नेता एचडी देवगौड़ा राजधानी में अनशन पर बैठ गए। देवगौड़ा ने […]

Author July 29, 2015 8:34 AM

किसानों की खुदकुशी की बाबत कृषिमंत्री राधामोहन सिंह के बयान पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। इस मुद्दे पर जनता दल (एकी) ने उनके खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे रखा है तो पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (एस) के नेता एचडी देवगौड़ा राजधानी में अनशन पर बैठ गए। देवगौड़ा ने कहा है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं पर जब तक संसद में बहस नहीं होगी, उनका अनशन जारी रहेगा। इसमें दो राय नहीं कि राधामोहन सिंह का बयान घोर संवेदनहीनता का परिचायक है।

पिछले हफ्ते संसद में दिए एक लिखित उत्तर में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे प्रेम-प्रसंग और नपुंसकता जैसे कारण बताए थे। इस पर स्वाभाविक ही तीखी प्रतिक्रिया हुई और इसका सिलसिला अब भी जारी है। देश का कृषिमंत्री ही किसानों के प्रति इस कदर संवेदनहीन हो, तो सरकार से किसानों के भले की क्या उम्मीद की जा सकती है? और भी विडंबना यह है कि अभी तक कृषिमंत्री ने अपने कहे पर खेद प्रकट नहीं किया है। उलटे उन्होंने अपने बयान को यह कह कर सही ठहराने की कोशिश की कि एनसीआरबी यानी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े उनके कथन की तस्दीक करते हैं।

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वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी कृषिमंत्री के बचाव में कहा कि संसद में दिया गया उनका बयान आंकड़ों पर आधारित था। क्या यह दावा सही है? हो सकता है एनसीआरबी में दर्ज आंकड़ों में ग्रामीण भारत में खुदकुशी की कुछ घटनाओं का कारण प्रेम प्रपंच, या गृह कलह हों। कुछ आत्महत्याओं की वजह बीमारी आदि से उपजी निराशा हो सकती है। पर कृषिमंत्री ने जो तस्वीर पेश की, वह किसानों के गहरे संकट में होने की हकीकत को झुठलाने की ओछी कोशिश के अलावा कुछ नहीं है। अगर प्रेम प्रसंग और नपुंसकता जैसी वजहों से ही आत्महत्याएं हो रही हैं, तो किसानों में ही खुदकुशी का ऐसा सिलसिला क्यों दिखता है?

एनसीआरबी 1995 से किसानों की खुदकुशी के आंकड़े दर्ज कर रहा है। इन आंकड़ों के मुताबिक तब से अब तक तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। आत्महत्या की ऐसी दर किसी और तबके में क्यों नहीं दिखती? इसका सीधा संबंध किसानों की हालत से है। खेती घाटे का धंधा बन गई है। जब फसल चौपट होती है तब तो किसान मुसीबत में होते ही हैं, पैदावार अच्छी होने पर भी वाजिब दाम न मिल पाने से वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। खेती के न पुसाने से खासकर छोटे और सीमांत किसान बराबर कर्ज में डूबे रहते हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में औसतन बयालीस किसान रोज खुदकुशी कर रहे हैं। अगर सूखे या बाढ़ या ओलावृष्टि से फसल बर्बाद हो, तो किसानों की खुदकुशी की घटनाएं और बढ़ जाती हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश में तिरानबे फीसद और तेलंगाना में साढ़े बाईस फीसद किसान कर्जग्रस्त हैं। हरित क्रांति में अग्रणी रहे पंजाब में भी पचास फीसद से अधिक किसानों की यही स्थिति है। पिछले दिनों आए सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े भी ग्रामीण भारत की बदहाली की गवाही देते हैं, जहां पचहत्तर फीसद परिवारों के सबसे ज्यादा कमाने वाले सदस्य की मासिक आय पांच हजार रुपए से कम है। इन सब तथ्यों से अवगत होते हुए भी देश के कृषिमंत्री ऐसी भाषा बोल रहे हैं जिसे किसानों का मखौल उड़ाना ही कहा जा सकता है।

 

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