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संपादकीय: किसान का दुख

इस मसले पर पहले से ही किसानों के बीच असंतोष पनप रहा था कि सरकार ने अध्यादेश जारी करने से पहले किसान संगठनों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया और बड़े कारपोरेटों के हित में एकतरफा फैसला लिया।

Agriculture Bills, Farmers Protestपंजाब में कृषि विधेयकों के खिलाफ किसान सड़कों पर उतरे हैं।

हरियाणा में कुरुक्षेत्र के पीपली में गुरुवार को किसानों की रैली में शामिल लोगों पर पुलिस ने जिस तरह लाठियां बरसाईं, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि क्या पुलिस हर ऐसे मौके पर लाठीचार्ज को ही अकेला उपाय मानती है! अगर किसान कुछ मुद्दों पर अपना विरोध जाहिर करने सड़क पर उतरे, तो संबंधित महकमों और मंत्रियों को उनकी मांगों पर विचार करने, उनके साथ अन्याय नहीं होने देने का आश्वासन देने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय दमन का रास्ता अख्तियार करके किसी आंदोलन की आवाज को खामोश करने की कोशिश को कैसे देखा जाएगा?

लाठी चार्ज में कई किसानों के सिर फूट गए और कई बुरी तरह घायल हो गए। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को सरकार की किसी नीति से सहमत नहीं होने, उस पर विरोध जताने और अपनी मांगें सामने रखने का अधिकार होता है। लेकिन उनकी असहमति और आंदोलन के मुद्दों को विचार करने लायक नहीं मानना और हिंसक तरीके से दमन करना किस तरह लोकतंत्र को बचाएगा? क्या पुलिस और प्रशासन के सामने किसानों के आंदोलन में शामिल लोगों से बातचीत के जरिए निपटने के सारे विकल्प खत्म हो गए थे?

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से जारी तीन अध्यादेशों को किसानों और खेती की समूची व्यवस्था के खिलाफ माना जा रहा है। इस मसले पर पहले से ही किसानों के बीच असंतोष पनप रहा था कि सरकार ने अध्यादेश जारी करने से पहले किसान संगठनों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया और बड़े कारपोरेटों के हित में एकतरफा फैसला लिया। दरअसल, एक नए अध्यादेश के तहत आलू, प्याज, दलहन, तिलहन और तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है।

किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि हमारे देश में पचासी फीसद लघु किसान हैं, जिनमें से ज्यादातर के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। अब तमाम सुविधाओं से लैस बड़ी कंपनियां अपने कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगी और बाद में उसका खमियाजा ग्राहकों को उठाना पड़ेगा। असली नुकसान किसानों का होगा। इसी तरह, किसानों का मानना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या व्यावसायिक खेती से संबंधित अध्यादेश किसानों को अपनी ही जमीन पर मजदूर बना देगा। फिर किसान उपज व्यापार वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण अध्यादेश-2020 के अमल में आने के बाद व्यवहार में मंडी व्यवस्था खत्म होने की आशंका जताई जा रही है, जिसका फायदा बड़े कारपोरेट और बिचौलियों को होगा।

जाहिर है, जिन मुद्दों को सरकार खेती-किसानी की सुधार के लिहाज से लाभदायक मानती है, उन्हीं पर किसानों के भीतर कई तरह की आशंकाएं हैं। इससे पहले बीस जुलाई को पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों ने केंद्र सरकार की कृषि से जुड़े तीनों अध्यादेशों के खिलाफ ट्रैक्टर रैली निकाल कर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि सरकार को किन वजहों से किसानों की मांग पर विचार करना जरूरी नहीं लगा। यही वजह है कि उसके बाद घोषित नियमों के अमल से चिंतित किसानों के भीतर असंतोष बढ़ता रहा।

सवाल है कि इन आशंकाओं का समाधान करने के बजाय उनके दमन का रास्ता अख्तियार करके किसका हित सुनिश्चित किया जा रहा है! अब तक देश में जब भी आर्थिक संकट गहराया है, उससे पार पाने में कृषि क्षेत्र ही सबसे अहम मददगार साबित हुआ है। यह स्थिति तब है, जब देश के किसान तमाम तरह के अभावों, कर्ज और संसाधनों की कमी से जूझते हुए किसी तरह कृषि क्षेत्र को संतोषजनक हालात में बचाए हुए हैं। इसलिए सरकार अगर कृषि क्षेत्र में कोई सुधार करना चाहती है तो देश के किसानों की आशंकाओं का समाधान करना उसकी जिम्मेदारी है।

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