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संपादकीयः आशंका बनाम सुधार

पिछले दिनों हरियाणा में बड़ी संख्या में किसान इन अध्यादेशों के खिलाफ सड़क पर उतर आए और पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज भी किया था। लेकिन इसके बाद किसानों के विरोध का दायरा और फैल गया और अब वे सरकार से इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

पिछले दिनों हरियाणा में बड़ी संख्या में किसान इन अध्यादेशों के खिलाफ सड़क पर उतर आए और पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज भी किया था।

किसानों के विरोध आंदोलन के बीच लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए गए, जो कृषि क्षेत्र से जुड़े तीन अध्यादेशों की जगह लेंगे। सरकार का मानना है कि इससे कृषि और किसानों की स्थिति बेहतर करने के रास्ते निकलेंगे और सुधार के नए विकल्प खड़े होंगे। हो सकता है कि सरकार इसका जो मकसद बता रही है, उसी के मुताबिक आने वाले दिनों में कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदले। लेकिन जिन कानूनों के प्रभाव में देश का एक बड़ा तबका आने वाला है, उसकी ओर से उठने वाली आशंकाओं के समाधान की कोशिश सरकार ने पहले क्यों नहीं की! आखिर क्या वजह है कि कृषि जगत में सुधार के दावे के साथ जारी अध्यादेशों के विरोध में देश भर के किसान सड़क पर उतर आए और इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं! राष्ट्रीय किसान महासंघ ने बुधवार को इस मसले पर दिल्ली में प्रदर्शन किया और कहा कि ये अध्यादेश वास्तव में किसान विरोधी हैं, इसके बावजूद सरकार इसे कानून बनाने की कोशिश कर रही है और हम ऐसा नहीं होने देंगे। दूसरी ओर सरकार इन विधेयकों में दर्ज प्रावधानों को किसानों के हित में बता रही है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों हरियाणा में बड़ी संख्या में किसान इन अध्यादेशों के खिलाफ सड़क पर उतर आए और पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज भी किया था। लेकिन इसके बाद किसानों के विरोध का दायरा और फैल गया और अब वे सरकार से इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहे हैं। दरअसल, इन अध्यादेशों की जगह लेने वाले विधेयकों के विरोध में किसानों का कहना है कि इससे बनने वाली नई व्यवस्था में किसान पूरी तरह लाचार होकर रह जाएंगे। मसलन, एक अध्यादेश के तहत आलू, प्याज, दलहन, तिलहन और तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। जबकि यह जगजाहिर तथ्य है कि देश के ज्यादातर किसानों के पास भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है और इसका सीधा फायदा उन कंपनियों को मिलेगा, जिनके पास अथाह संसाधन और सुविधाएं होती हैं। वे कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगी और इसका खमियाजा ग्राहकों को उठाना पड़ेगा। इसी तरह, एक अध्यादेश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने को लेकर किसान इसलिए चिंतित हैं कि अगर यह कानून बन गया तो इससे किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाएंगे। इसके अलावा, किसान मंडी से संबंधित नई व्यवस्था लागू होने के बाद खरीद-बिक्री का नियंत्रण व्यवहार में कारपोरेट क्षेत्र और बिचौलियों के हाथों में चले जाने की आशंका जता रहे हैं।

हालांकि सरकार की दलील है कि नए कानून बन जाने के बाद किसान अपनी उपज की कीमत तय कर सकेंगे और जहां चाहेंगे, वहां अपनी उपज बेच सकेंगे। साथ ही किसानों के अधिकारों का इजाफा होगा और बाजार में प्रतियोगिता बढ़ेगी। लेकिन किसानों की आशंकाओं को आधार माना जाए तो केंद्र सरकार पश्चिमी देशों की तरह का मॉडल यहां थोपना चाहती है, जबकि भारत में भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और यहां खेती-किसानी मुख्य रूप से व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवनयापन का जरिया है। फिर संसाधनों और सुविधाओं के मामले में संपन्न कारपोरेट जब इस क्षेत्र में उतरेंगे, तो फसलों की खरीद से लेकर उनके भंडारण की नई व्यवस्था से तैयार बाजार में किसान और उपभोक्ता के हिस्से क्या आएगा! यह ध्यान रखने की जरूरत है कि तमाम सीमाओं और अभावों के बावजूद देश के कृषि क्षेत्र ने आर्थिक संकट के दौर में बड़े सहायक की भूमिका निभाई है। इसलिए नए कानूनों के जरिए कृषि क्षेत्र का भावी स्वरूप तय करने को लेकर आश्वस्त सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह किसानों की चिंताएं दूर करे।

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