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दलित पर कहर

हरियाणा के एक गांव में एक दलित परिवार पर जो कहर बरपा वह स्तब्ध कर देने वाला है। खबर है कि फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में मंगलवार को तड़के कुछ दबंगों ने एक दलित परिवार के घर में पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। परिवार के दोनों बच्चे जिंदा जल मरे। दोनों में एक ढाई […]

Author Published on: October 21, 2015 12:23 PM

हरियाणा के एक गांव में एक दलित परिवार पर जो कहर बरपा वह स्तब्ध कर देने वाला है। खबर है कि फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में मंगलवार को तड़के कुछ दबंगों ने एक दलित परिवार के घर में पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। परिवार के दोनों बच्चे जिंदा जल मरे। दोनों में एक ढाई साल का बच्चा था और एक ग्यारह महीने की बच्ची। बच्चों की मां भी बुरी तरह झुलस गई। पिता भी घायल है। अपने दोनों बच्चों को खो देने से इन माता-पिता की क्या दशा होगी, कल्पना की जा सकती है। पर यह कोई हादसा नहीं था। दिल हिला देने वाली यह एक ऐसी घटना है, जो हमारे सामाजिक ढांचे से भी वास्ता रखती है और कानून तथा प्रशासन से भी।

यों शुरुआती छानबीन के बाद पुलिस के एक आला अधिकारी ने कहा कि पीड़ितों के घर पर हमले का कोई निशान नहीं मिला, आग केवल उस बिस्तर पर लगी थी जिस पर पीड़ित सोए हुए थे। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि बिस्तर में आग कैसे लगी। हमले का कोई निशान न देखने की बात कहने के पीछे क्या इरादा हो सकता है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। हमले के निशान का मतलब केवल तोड़-फोड़ नहीं होता। बच्चों के पिता का कहना है कि पेट्रोल डाल कर आग लगाई गई। कुछ दिन पहले आपसी झगड़े के बाद आरोपियों से उन्हें परिवार को तबाह कर देने की धमकियां मिल रही थीं। इस पृष्ठभूमि और आग लगने के तरीके में गए बिना कोई निष्कर्ष प्रचारित करना पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े करता है। बहरहाल, इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखने की जरूरत है। प्रतिव्यक्ति आय के लिहाज से हरियाणा की गिनती आगे बढ़े हुए राज्यों में होती रही है। मगर सामाजिक प्रगतिशीलता के मानकों पर इसकी दशा चिंताजनक है। हरियाणा में दलितों की आबादी चालीस लाख है और पंजाब में सत्तर लाख। फिर भी, हरियाणा में दलितों के खिलाफ होने वाली हिंसा और अपराध के आंकड़े पंजाब से ज्यादा हैं।

यह सिलसिला कांग्रेस के राज में भी चलता रहा और भाजपा सरकार के दौर में भी जारी है। दूसरे राज्यों से भी ऐसी खबरें आती रहती हैं। कई लोगों का मानना है कि निजी झगड़ों को भी दलितों के खिलाफ हिंसा का मामला मान लिया जाता है और दलितों पर अत्याचार के आंकड़ों में बढ़ोतरी दिखने का यह एक बड़ा कारण है। हो सकता है ऐसे कुछ मामले होते हों। पर उससे ज्यादा पैमाने पर जो होता है वह यह कि दलितों के खिलाफ संगीन अपराध और जुल्म के बहुत-से मामलों में मुकम्मल जांच नहीं होती। सबूत जुटाने में पुलिस कोताही बरतती है। आरोपी अक्सर रसूख वाले या दबंग होते हैं।

इसी कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें बचाने का दबाव पुलिस पर काम करता है। नतीजतन, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ संगीन अपराध के मामलों में सजा मिलने की दर बहुत कम रही है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून, 1989 में दंड प्रक्रिया संहिता के मुकाबले ज्यादा सजा के प्रावधान किए गए। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की गर्इं। लेकिन अगर क्रियान्वयन को लेकर गंभीरता और निगरानी न हो, तो ज्यादा सजा के प्रावधान से भी क्या फर्क पड़ता है! हरियाणा में दलित-विरोधी हिंसा के मामलों में न्याय मिल पाने का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। क्या फिर वही कहानी दोहराई जाएगी, या इंसाफ की मिसाल देखने को मिलेगी?

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