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भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आपसी विचार-विमर्श की साझा बैठकें पहले भी समय-समय पर होती रही हैं। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद पहली बार इस तरह की शीर्ष बैठक आयोजित हुई।

Author September 6, 2015 9:01 AM

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आपसी विचार-विमर्श की साझा बैठकें पहले भी समय-समय पर होती रही हैं। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद पहली बार इस तरह की शीर्ष बैठक आयोजित हुई। तीन दिन की इस समन्वय बैठक में जिस तरह केंद्र के तमाम वरिष्ठ मंत्रियों ने शिरकत की, और शुक्रवार को प्रधानमंत्री भी वहां पहुंचे, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार और संघ के बीच रिश्ता क्या है।

भाजपा यह दोहराती आई है कि संघ से उसका संबंध वैचारिक है। यही बात संघ की तरफ से भी भाजपा को लेकर कही जाती रही है। लेकिन पार्टी का तर्क सरकार पर लागू नहीं होता। सरकार में ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका संघ से जुड़ाव रहा हो या हो, पर सरकार की कार्यप्रणाली संविधान से निर्देशित होती है और वह देश की जनता तथा संसद के प्रति जवाबदेह होती है।

लेकिन इस समन्वय बैठक से यही संकेत गया है कि लगता है सरकार का एजेंडा संघ तय कर रहा है। यों बैठक का पूरा ब्योरा जाहिर नहीं हुआ है, पर खबरों के मुताबिक संघ के नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा से लेकर पीडीपी से गठबंधन के स्वरूप, समान रैंक समान पेंशन, शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम तक, तमाम मुद््दों पर मंत्रियों से सवाल-जवाब किए।

ऐसा लगा कि सरकार के कामकाज को लेकर सबसे बड़ी कसौटी संघ की संतुष्टि है! अगर संघ खुश है तो सब ठीक है, वरना ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा पर संघ का नियंत्रण किसी न किसी हद तक शुरू से रहा है। इसलिए भाजपा जब भी जहां भी सत्ता में आई, पार्टी के जरिए सरकार के कामकाज में भी संघ का थोड़ा-बहुत दखल देखने में आता रहा। लेकिन पार्टी में परोक्ष हस्तक्षेप बढ़ते-बढ़ते प्रत्यक्ष नियंत्रण का रूप ले चुका है और अब मंत्रियों ने भी संघ के दखल को सहज मान लिया है।

मोदी ने मजबूत नेतृत्व के दावे के साथ जनादेश मांगा था। यह कैसी मजबूती है, जो संघ के सामने लाचारी में बदल जाती है? जिन्हें जनता ने चुना है, वे जनता से बगैर चुने हुए किसी संगठन के प्रति जवाबदेह क्यों हों? इसलिए संघ-भाजपा की इस समन्वय बैठक को लेकर कई विपक्षी दलों ने कुछ सवाल उठाए हैं। इस पर संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा है कि मंत्रिगण सभा-सम्मेलनों में अपनी बात रखते हैं, मीडिया को भी संबोधित करते हैं, लिहाजा संघ से संवाद में क्या गलत है।

हर्ज की कोई बात न होती, अगर यह संवाद स्वतंत्र भाव से होता। खटकने वाली बात भाजपा नेताओं और मंत्रियों का इस ढंग से पेश आना है जैसे उनकी सरकार का कर्तव्य और सबसे बड़ी प्राथमिकता संघ की अपेक्षाएं पूरी करना है! यह कैसा समन्वय है जिसमें संघ तो हिसाब मांगता है, पर भाजपा कभी संघ से जवाब तलब नहीं कर पाती।

संघ अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता रहा है, पर हकीकत सामने है। एक सुरक्षित दूरी से, भाजपा के अहम फैसलों को इस हद तक प्रभावित कर पाने की स्थिति संघ के लिए आज भले सुखद हो, पर देर-सबेर राजनीति की विकृतियां उसे भी अपनी गिरफ्त में ले सकती हैं, और वहां तक ले जा सकती हैं कि लौटना मुश्किल हो जाए। भाजपा के लिए भी अपनी स्वायत्तता महसूस करना और कठिन होता जाएगा।

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