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संपादकीय: पूर्णबंदी के सबक

पूर्णबंदी का मकसद यह था कि लोग घरों से नहीं निकलेंगे और इससे सुरक्षित दूरी के नियम का पालन होगा। लेकिन व्यवहार में एक सीमा के बाद ऐसा संभव हो नहीं पाया। इसलिए अब महामारी को फैलने से रोक पाना अब ज्यादा मुश्किल हो गया है।

COVID-19 और Lockdown के बीच बस की छत पर सवार होकर गृह राज्यों के लिए रवाना होते प्रवासी मजदूर। (फोटोः पीटीआई)

भारत में पूर्णबंदी को दो महीने पूरे हो चुके हैं। कोरोनाविषाणु के फैलाव को रोकने के लिए सबसे पहले और महत्त्वपूर्ण उपाय के तौर पर चीन, स्पेन, इटली आदि दूसरे देशों की तरह भारत में भी पूर्णबंदी लागू की गई। इन दो महीनों में काफी कुछ अच्छे-बुरे अनुभव हुए और ऐसे ही परिणाम भी सामने आए। यह एक बहस का विषय हो सकता है कि पूर्णबंदी के बावजूद भारत में कोरोना का फैलाव नहीं रुका और अब दो महीने बाद स्थिति कहीं ज्यादा खराब हो रही है। लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पूर्णबंदी लागू करने से पहले दूसरे देशों से आने वाले लोगों की हवाई अड््डों पर जांच जैसे सुरक्षात्मक कदम उठाने में हुआ विलंब भी देश पर भारी पड़ा।

पूर्णबंदी का मकसद यह था कि लोग घरों से नहीं निकलेंगे और इससे सुरक्षित दूरी के नियम का पालन होगा। लेकिन व्यवहार में एक सीमा के बाद ऐसा संभव हो नहीं पाया। इसलिए अब महामारी को फैलने से रोक पाना अब ज्यादा मुश्किल हो गया है।

देश के कुछ राज्यों में जिस तेजी से हालात बिगड़ते जा रहे हैं, वह चिंता का विषय है। सबसे गंभीर स्थिति महाराष्ट्र की है, जहां कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा जल्द ही पचास हजार के पार निकल जाएगा। गुजरात, तमिलनाडु, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश भी ऐसे ही राज्य हैं, जहां संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसीलिए रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या पूर्णबंदी का इन राज्यों में कोई फायदा नहीं हुआ। इतना तो निश्चित है कि कोरोना महामारी की कोई कारगर दवा नहीं होने की वजह से सरकारों के हाथ में बचाव के उपायों को अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

अस्पतालों में तरह-तरह की दवाओं के प्रयोग हो रहे हैं। राहत की बात इतनी ही है कि भारत में कोरोना से होने वाली मौतों की दर अभी न केवल कम है, बल्कि ठीक होने वाले मरीजों की औसत दर भी अपेक्षाकृत ज्यादा है। लेकिन देश में जिस तेजी से संक्रमितों की संख्या बढ़ रही है, उसकी तुलना में ठीक होने का अनुपात काफी कम है।

इन दो महीनों में देश को महामारी के साथ ही दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। एक, महामारी के कारण चौपट हुई अर्थव्यवस्था और दूसरी प्रवासी मजदूरों का पलायन। प्रधानमंत्री की अपील के बावजूद अधिसंख्य उद्योगों ने अपने यहां काम करने वाले श्रमिकों को निकालने में जरा देर नहीं लगाई। अचानक पूर्णबंदी से लाखों छोटे उद्योग तो अपने आप ही बंद हो गए और कामगार बेरोजगार। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगार आज जिस तरह सड़कों पर हैं और घरों को लौट रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। अब सबसे बड़ा खतरा इन प्रवासियों के जरिए ग्रामीण इलाकों में महामारी का फैलने का है।

प्रवासी मजदूरों को लेकर हुई राजनीति भी शर्मसार करने वाली रही। जो वक्त गुजर गया, उसे अब भूलना ही श्रेष्ठ है। अब आने वाले समय की चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी हैं। सरकार पहले ही कह चुकी है कि लोगों को कोरोना के साथ रहने अभ्यस्त बनना पड़ेगा। सुरक्षित दूरी और मास्क जैसे बुनियादी उपाय से अपनी रक्षा करनी होगी। जाहिर है, कोरोना की जंग सरकार के बूते नहीं लड़ी जा सकती। व्यवस्था अपनी सीमाओं से बंधी है। ऐसे में सभी नागरिकों को अब और ज्यादा जिम्मेदार बनना पड़ेगा।

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