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संपादकीयः प्रदूषण की रिहाइश

दिल्ली सरकार लगातार जाहिर करती रही है कि वह प्रदूषण रोकने को लेकर काफी गंभीर है। मगर वह सचमुच गंभीर होती, तो इस तरह प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयां अवैध रूप से रिहाइशी इलाकों में न चल रही होतीं।

Author October 18, 2018 1:50 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

पंद्रह साल से ऊपर होने को आए जब दिल्ली की रिहाइशी कॉलोनियों में चल रहे प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को हटा कर राजस्थान-हरियाणा की सीमा पर भिवाड़ी और उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में बसाने का अभियान चला था। कारखाना मालिकों ने अपनी सुविधा के अनुसार इन औद्योगिक क्षेत्रों में भूखंड आबंटित करा लिए। मगर हकीकत यह है कि अब भी दिल्ली के कई इलाकों, यहां तक कि रिहाइशी कॉलोनियों के भीतर प्रदूषण फैलाने वाले कारखाने चल रहे हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी कई बार इन इकाइयों को पूरी तरह हटाने का आदेश दे चुका है, पर दिल्ली सरकार इस मामले में नाकाम साबित हुई है। इसलिए एनजीटी ने दिल्ली सरकार पर पचास करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना सिर्फ ऐसी इकाइयों को न हटाए जाने को लेकर लगाया गया है, जिनमें स्टील पिकलिंग यानी लोहे पर से जंग, दाग और गंदगी हटाने का काम किया जाता है। लोहे या स्टील की गंदगी साफ करने में तेजाब का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे बाद में नालियों के जरिए नदी में बहा दिया जाता है। मगर इनके अलावा भी चोरी-छिपे अनेक ऐसे कारखाने दिल्ली के रिहाइशी इलाकों में चलते हैं, जिनसे वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण बढ़ता है।

दिल्ली सरकार लगातार जाहिर करती रही है कि वह प्रदूषण रोकने को लेकर काफी गंभीर है। मगर वह सचमुच गंभीर होती, तो इस तरह प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयां अवैध रूप से रिहाइशी इलाकों में न चल रही होतीं। बहुत सारी इकाइयां उन इलाकों में अब भी बनी हुई हैं, जो दिल्ली विकास प्राधिकरण ने नहीं बसाए हैं। ये मुख्य रूप से दिल्ली की शहरी योजनाओं के भीतर आ गए गांवों, अनधिकृत रूप से बसी कॉलोनियों आदि में चलती हैं। चूंकि इनका पंजीकरण नहीं होता, इसलिए सरकार का तर्क हो सकता है कि इन पर नजर रखना उसके लिए मुश्किल होता है। पर यह तर्क इसलिए गले नहीं उतरता कि ये इलाके किसी से छिपे नहीं हैं। इन इलाकों में रहने और इन इकाइयों में काम करने वाले लोग लोकसभा से लेकर नगर निगम तक के चुनाव में मतदान करते हैं। इन इलाकों में बिजली, पानी, सड़क, सफाई तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं। पुलिस के सुरक्षा दस्ते उन इलाकों पर नजर रखते हैं। फिर कैसे माना जा सकता है कि उन इलाकों में चल रही अवैध औद्योगिक इकाइयों के बारे में सरकारी तंत्र को जानकारी नहीं मिल पाती!

छिपी बात नहीं है कि इस तरह की औद्योगिक इकाइयां राजनीतिक रसूख वाले लोगों की शह या इन पर नजर रखने वाले महकमे के अधिकारियों के साथ साठगांठ से चल रही होती हैं। चूंकि इनका पंजीकरण नहीं होता, इसलिए इनमें कारखाना कानून के मुताबिक सुरक्षा, सफाई, कर्मचारियों के वेतन-भत्तों आदि पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। इनसे निकलने वाला प्रदूषित जल बिना शोधन के सीधे नालियों के जरिए बहा दिया जाता है। इनके धुएं पर नियंत्रण को लेकर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। इन इकाइयों की मनमानी पर तब ध्यान जाता है, जब इनमें कोई बड़ा हादसा हो जाता है। पर यह समझ से परे है कि कोई भी सरकार लोगों की सेहत की कीमत पर प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को कैसे रिहाइशी इलाकों या फिर भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों में कारोबार चलाते रहने की छूट दे सकती है! केवल स्टील पिकलिंग नहीं, ऐसी दूसरी इकाइयों की मनमानी पर भी रोक लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है।

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