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संपादकीयः टूटते पुल

कोलकाता के माझेरहाट पुल के एक हिस्से का अचानक ढह जाना व्यवस्थागत खामियों का एक और उदाहरण है। इस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई और करीब पच्चीस लोग घायल हो गए।

Author September 6, 2018 2:10 AM
यह पहली घटना नहीं है, जब किसी पुल के गिरने से लोगों की जान पर बन आई। करीब ढाई साल पहले कोलकाता में ही इसी तरह एक पुल गिर गया था, पर हैरानी की बात है कि सरकार ने उससे कोई सबक नहीं लिया।

कोलकाता के माझेरहाट पुल के एक हिस्से का अचानक ढह जाना व्यवस्थागत खामियों का एक और उदाहरण है। इस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई और करीब पच्चीस लोग घायल हो गए। जिस वक्त यह पुल गिरा, लोग दफ्तरों से अपने घर लौट रहे थे। जाहिर है, वह भीड़भाड़ का समय था। यह पुल दक्षिण कोलकाता के व्यस्ततम इलाके में बना हुआ था और इससे लोगों को आवागमन में काफी सुविधा होती थी। मुख्यमंत्री ने इस हादसे की उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया है। मगर यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि जब दो साल पहले ही राज्य की इंजीनियरिंग और कंसलटेंसी एजेंसी ने शहर के कुछ पुलों की हालत खस्ता होने की सूचना दे दी थी, जिसमें माझेरहाट पुल भी शामिल था, तो उस पर गंभीरता से ध्यान क्यों नहीं दिया गया। बताया जा रहा है कि इस पुल के सुधार का काम राज्य के लोक निर्माण विभाग को करना था, पर प्रशासनिक अड़चनों की वजह से काम टलता गया था। यह पुल पचास साल पुराना था।

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यह पहली घटना नहीं है, जब किसी पुल के गिरने से लोगों की जान पर बन आई। करीब ढाई साल पहले कोलकाता में ही इसी तरह एक पुल गिर गया था, पर हैरानी की बात है कि सरकार ने उससे कोई सबक नहीं लिया। पुलों और सड़कों के रखरखाव की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग की है। मगर जरूरी मरम्मत के लिए भी उसे विभिन्न कार्यालयों से अनुमति और धन आदि जुटाने में प्राय: इतनी देर हो जाती है कि ऐसे हादसे हो जाते हैं। पहली बात तो यह कि पुलों के निर्माण में जरूरी पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। जब भी कोई सड़क और पुल बनाया जाता है, तो आने वाले समय में उस पर पड़ने वाले बोझ और भीड़भाड़ का आकलन सबसे पहले किया जाता है। उसी के अनुरूप उसकी चौड़ाई और मजबूती आदि पर ध्यान दिया जाता है। मगर देखा जाता है कि बहुत सारे पुल बहुत कम समय में दरक जाते हैं या निर्माण प्रक्रिया में ही धराशायी हो जाते हैं। माझेरहाट पुल महज पचास साल पुराना था। इतनी कम अवधि में वह जर्जर हो गया और बोझ सहन न कर पाने की वजह से ढह गया, तो जाहिर है, उसे बनाते समय जरूरी बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया गया। फिर समय-समय पर उसकी मरम्मत में भी लापरवाही बरती गई।

विचित्र है कि अक्सर सरकारें सड़कों और पुलों आदि की मरम्मत की तब तक अनदेखी करती रहती हैं, जब तक कि कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता। जगह-जगह सड़कों पर गड्ढे बने रहते हैं, लोग महीनों उनमें से जोखिम उठाते हुए गुजरते रहते हैं, पर उन्हें भरा नहीं जा पाता। अगर समय पर मरम्मत हो जाए, तो सड़कों और पुलों के रखरखाव पर बड़े खर्च और हादसों से बचा जा सकता है। जो पुल थोड़ा पैसा खर्च करके मरम्मत से ठीक हो सकता था, उसके गिरने के बाद नया पुल बनाना कितना खर्चीला काम होता है, अंदाजा लगाया जा सकता है। मगर प्रशासनिक अड़ंगेबाजी और अनदेखी की वजह से सार्वजनिक धन की बर्बादी और लोगों की जान पर बन आती है। पश्चिम बंगाल सरकार ने माझेरहाट पुल ढहने की जांच के आदेश तो दे दिए हैं, पर इसमें जिम्मेदारी किसकी तय होगी, देखने की बात है। ऐसे हादसों के बाद किस तरह जांच में अक्सर ढकने-छिपाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं, छिपी बात नहीं है।

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