जिस चुनावी प्रक्रिया पर विपक्षी दलों की ओर से लगातार सवाल उठाए जाते रहे हों, कई तरह के आरोप लगाए जा रहे हों, उस पर कोई स्पष्टता आने के बजाय अगर चुनाव से जुड़े संसाधनों को लेकर घोर लापरवाही बरती जाए, तो इसे क्या कहा जाएगा?
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ, लेकिन उसमें उपयोग में लाई गई करीब चार हजार इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों का जल कर खाक हो जाने की घटना संदेह पैदा करती है।
पिछले हफ्ते कोलकाता की सरकारी इमारत में ऊपरी मंजिलों पर रखी मशीनों में आग लग जाने के पीछे विपक्षी दलों ने साजिश की आशंका जताई है। सवाल है कि सभी ईवीएम अगर उच्च सुरक्षा क्षेत्र में रखी गई थीं, तो वहां आग कैसे लगी?
खबरों के मुताबिक, तीसरी मंजिल पर लगी आग सातवीं-आठवीं मंजिल तक पहुंच गई, जहां ईवीएम रखी गई थी। जांच के बाद जो भी तथ्य सामने आएं, लेकिन जिन इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों से मतदान कराने को लेकर तमाम विपक्षी दलों की ओर से बार-बार सवाल उठाए जाते रहे हैं, उनकी सुरक्षा और निगरानी में ऐसी गंभीर लापरवाही कैसे बरती गई?
इतनी बड़ी तादाद में ईवीएम जल जाने की घटना के बाद स्वाभाविक ही न सिर्फ राजनीतिक दलों का, बल्कि मतदाताओं का भी भरोसा एक बार फिर डगमगाएगा।
गौरतलब है कि बंगाल में चुनाव के पहले और उसके दौरान तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। गंभीर आरोपों के बीच क्या यह चुनाव आयोग का दायित्व नहीं था कि वह ईवीएम की सुरक्षा और विश्वसनीयता को कायम रखने के पुख्ता इंतजाम करता? इससे जुड़े कई आरोपों पर स्पष्टता लाने के विपरीत हुआ यह कि पश्चिम बंगाल में ईवीएम के जल जाने की घटना ने संदेहों को और पुख्ता कर दिया है।
ऐसे समय में जब वोटों की गिनती में गड़बड़ियों की जांच की मांग को लेकर अदालतों से हस्तक्षेप की मांग की जा रही हो, यह घटना चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करती है। ईवीएम जल जाने की घटना के बाद मतदाताओं का भरोसा एक बार फिर कसौटी पर है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि लोकतंत्र मतदाताओं के विश्वास से चलता है। इसके टूटने से उसकी बुनियाद हिल सकती है।
