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महामारी गांव तक

ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैलती महामारी ने चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्टें बता रही हैं कि अब ग्रामीण इलाकों में संक्रमण पैर पसार चुका है। जितने मामले आ रहे हैं, उसमें लगभग आधे मामले ग्रामीण इलाकों से हैं।

वैरिएंट के अगले म्यूटेशन के संक्रमण करने की रफ्तार बहुत अधिक है और इसमें एंटीबॉडीज़ को चकमा देने की क्षमता भी अधिक होती है। (फोटो – पीटीआई)

ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैलती महामारी ने चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्टें बता रही हैं कि अब ग्रामीण इलाकों में संक्रमण पैर पसार चुका है। जितने मामले आ रहे हैं, उसमें लगभग आधे मामले ग्रामीण इलाकों से हैं। मौतों का आंकड़ा शहरों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल नहीं है कि गांवों में हालात किस तेजी से बिगड़ रहे हैं। यह कहना भी सही नहीं होगा कि यह सब अचानक हुआ या सरकारों को इसका अंदेशा पहले से नहीं रहा होगा। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे कि ग्रामीण इलाकों में संक्रमण फैलना कहीं ज्यादा बड़ा खतरा साबित होगा। पर जिस तरह से गांवों को लेकर हर स्तर पर अनदेखी और लापरवाही होती रही, उसी का नतीजा है कि अब वहां हालात बदतर हो रहे हैं। अभी मुश्किल यह है कि सरकारें शहरों में मचे हाहाकार से ही निपट पाने में लाचार हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि गांवों में संक्रमण को फैलने से कैसे रोका जाए?

दूसरी लहर की मार ने स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत उजागर कर दी है। कमोबेश सभी राज्यों में हालात एक जैसे हैं। अस्पताल मरीजों से अटे पड़े हैं। आॅक्सीजन, बिस्तर, दवाइयां और जरूरी चीजों के लाले पड़ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं। दिल्ली में लोगों को किन दर्दनाक परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ रहा है, पूरी दुनिया देख रही है। ऐसे में गांवों में संक्रमण के हालात से लोग और सरकारें कैसे निपटेंगी, कोई नहीं जानता। हालात की गंभीरता से चिंतित इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि गांवों में महामारी से वह कैसे निपटेगी।

सामान्य दिनों में भी छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए ग्रामीणों को शहरों के धक्के खाने पड़ते हैं। कहने को सरकारी रिकार्ड में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और सामुदायिक चिकित्सा केंद्र हैं, पर इलाज की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। मध्यप्रदेश में ग्रामीण आबादी सवा पांच करोड़ के आसपास है। जबकि ग्रामीण इलाकों में आइसीयू बिस्तरों की संख्या मात्र इक्यावन और आॅक्सीजन बिस्तरों की संख्या तीन सौ अड़तीस है। राजस्थान में कुल संक्रमण के मामलों में चालीस फीसद मामले गांवों से आए हैं। जबकि राज्य के ग्रामीण इलाकों में आॅक्सीजन बिस्तरों की संख्या तीन हजार भी नहीं है। गुजरात हो या पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश हो या महाराष्ट्र, ज्यादातर राज्यों की हालत कमोबेश एक जैसी ही है। ग्रामीण आबादी के मुकाबले चिकित्सा सुविधाएं नहीं के बराबर ही हैं। इसका एक कारण ग्रामीण क्षेत्रों का सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होना भी माना जा सकता है।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि गांवों को महामारी की मार से बचा पाना संभव नहीं था। सरकारें थोड़ी भी सजग होतीं तो समय रहते गांवों के चिकित्सा तंत्र को ठीक किया जा सकता था। इससे हालात बिगड़ने से बच जाते। लेकिन हैरत है कि दूसरी लहर में ही चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव कराए गए। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराए गए। और केंद्र से लेकर राज्य सरकारों, चुनाव आयोग और किसी भी राजनीतिक दल ने इन चुनावों टालने की इच्छा या जरूरत या साहस नहीं दिखाया। इसका नतीजा आज इन प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में कोरोना के महाविस्फोट के रूप में देखने को मिल रहा है। क्या इस बात से कोई इंकार कर सकता कि राज्यों के पास ग्रामीण इलाकों में जांच से लेकर इलाज तक का पर्याप्त तंत्र नहीं है। सब शहरों के भरोसे हैं। ऐसे में सरकारें कैसे रोजाना हजारों लोगों को मरने से बचा पाएंगी?

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