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भूख से मौतें

इक्कीसवीं सदी में भी अगर यह सुनने को मिले कि भूख से हर मिनट ग्यारह लोगों की मौत हो रही है तो इससे ज्यादा पीड़ादायक और क्या होगा!

सांकेतिक फोटो।

इक्कीसवीं सदी में भी अगर यह सुनने को मिले कि भूख से हर मिनट ग्यारह लोगों की मौत हो रही है तो इससे ज्यादा पीड़ादायक और क्या होगा! आॅक्सफेम ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया है कि महामारी के दौर में भूख से दम तोड़ने वालों की तादाद सामान्य दिनों के मुकाबले काफी बढ़ गई है। यह ज्यादा चिंता की बात इसलिए भी है कि भुखमरी का सामना करने वालों की तादाद में दो करोड़ से ज्यादा का इजाफा हो गया है। हो सकता है यह आंकड़ा और ज्यादा भी हो। मोटा अनुमान बताता है कि पंद्रह करोड़ से ज्यादा लोगों भूखे पेट सो रहे हैं, या कई-कई दिन बिना खाए गुजार रहे हैं। यह हालत अफ्रीकी महाद्वीप के देशों से लेकर दुनिया के कई विकासशील देशों की है। पिछले एक साल में हालात इसलिए भी ज्यादा बिगड़े क्योंकि दुनिया के लगभग सारे देश महामारी और इसके दुष्प्रभावों का सामना कर रहे हैं। जाहिर है ऐसे में सबसे ज्यादा असर उन देशों पर ही पड़ रहा है जो हर तरह से गरीबी की मार झेलने को अभिशप्त हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने तो साल भर पहले ही अंदेशा जता दिया था कि महामारी की मार से पांच करोड़ लोग और बेहद गरीबी में चले जाएंगे। उनका यह अंदेशा आज हकीकत के रूप में सामने है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आधी से ज्यादा दुनिया गरीबी और भुखमरी की समस्या से जूझ रही है। हालांकि महामारी से पहले भी स्थिति कम विकट नहीं थी। पर महामारी ने इसे और बदतर कर डाला। भुखमरी की समस्या उन देशों में कहीं ज्यादा विकराल है जो गृहयुद्ध जैसे संकट से जूझ रहे हैं, राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों का सामना कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र व अन्य विदेशी मदद पर निर्भर हैं। पिछले एक साल में ज्यादा मुश्किल इसलिए भी खड़ी हुई क्योंकि वैश्विक खाद्य कार्यक्रम को मदद देने वाले देश ही महामारी के संकट में फंस गए। गौरतलब है कि वैश्विक खाद्य कार्यक्रम और दूसरे राहत अभियानों के लिए अमेरिका, रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस जैसे धनी देश मदद देते रहे हैं। लेकिन अब इन देशों की अर्थव्यवस्था भी चरमराई पड़ी है। ऐसे में गरीबों को खाना मुहैया कराने का अभियान ठंडा पड़ गया है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने करीब बीस करोड़ लोगों को राहत पहुंचाने के लिए पैंतीस अरब डॉलर की मांग की थी। पर मिले सिर्फ सत्रह अरब डॉलर ही थे। ऐसे में भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए और मदद कौन देगा, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

भुखमरी, गरीबी जैसी समस्याओं से निपटना चुनौतीभरा तो जरूर है, पर असंभव नहीं। आज जिन देशों में भी बड़ी आबादी इन गंभीर मानवीय संकटों का सामना कर रही है तो इसके मूल में उन देशों की नीतियां ही ज्यादा जिम्मेदार हैं। ज्यादातर अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश सत्ता संघर्ष जैसे संकट का सामना कर रहे हैं। गृहयुद्ध के कारण लोग देश छोड़ने को मजबूर हैं। विकासशील देशों में स्थिति इसलिए खराब है कि गरीब तबके को लेकर सरकारों का रुख और नीतियां उपेक्षापूर्ण ही रहती आई हैं। इसलिए भुखमरी और गरीबी से निपटने की योजनाएं बनती भी हैं तो वे सिरे नहीं चढ़ पातीं और आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब ही बना रहता है। गरीबी, कुपोषण और भुखमरी जैसी समस्याएं ही राष्ट्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा साबित होती हैं। ऐसे में गरीब तबके के उत्थान के प्रति सरकारों की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सरकारें जागरूक और जनसरोकार वाली हों तो उस देश में कम से कम भूख से तो कोई नहीं मरेगा।

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