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भावना बनाम कानून

आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के दोषी किशोर की रिहाई रोकने के मकसद से दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी। याचिका दिल्ली महिला आयोग ने दायर की थी..

Author नई दिल्ली | Published on: December 22, 2015 12:05 AM
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)

आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के दोषी किशोर की रिहाई रोकने के मकसद से दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी। याचिका दिल्ली महिला आयोग ने दायर की थी। न्यायालय के फैसले पर शायद ही किसी को हैरानी हुई हो। अलबत्ता दिल्ली महिला आयोग की कानूनी परिपक्वता पर सवाल जरूर उठे हैं। रिहाई रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं है यह तभी साफ हो गया था जब दिल्ली हाईकोर्ट ने इस संबंध में दायर की गई सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका ठुकरा दी थी। दरअसल, कोई भी अदालत संबद्ध मामले में मौजूदा कानूनों के तहत ही विचार करती है। इसलिए अदालत किस आधार पर नाबालिग दोषी की रिहाई रोक सकती थी, जो किशोर न्याय कानून के तहत निर्धारित अधिकतम सजा पूरी कर चुका था?

पीड़ित परिवार के प्रति सहानुभूति और ऐसे मामलों में जताई जाने वाली चिंता अपनी जगह ठीक है, खुद मामले की सुनवाई कर रहे सर्वोच्च अदालत के जजों ने याचिकाकर्ता महिला आयोग के वकीलों से कहा कि हम आपकी चिंता साझा करते हैं, पर कानून की मनमर्जी व्याख्या नहीं की जा सकती। अदालत ने संकेत दिया कि आपको कानून के मोर्चे पर यानी कानून बदलवाने के लिए लड़ना चाहिए, न कि इस बात की अपेक्षा करनी चाहिए कि न्यायालय कानून से परे जाकर फैसला सुनाएगा। अदालत ने जो कहा वह तनिक भी अप्रत्याशित नहीं है। फिर दिल्ली महिला आयोग को उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद सर्वोच्च अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? चूंकि तीन साल पहले बड़े पैमाने पर उठी आंदोलन की लहर के कारण निर्भया मामला बहुचर्चित रहा है, इसलिए इसके बहाने स्त्री-सुरक्षा के मुद्दे पर अधिक चिंतित और सक्रिय दिखने की होड़ भी नजर आती है। जो कानून के जानकार नहीं हैं, उनकी टिप्पणियां निरी भावनात्मक हो सकती हैं। पर एक राज्य के महिला आयोग का कथन और कदम कानून के लिहाज से पुख्ता होना चाहिए। दिल्ली महिला आयोग इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

आयोग के वकीलों को अहसास रहा होगा कि कानून का हवाला देकर वे रिहाई नहीं रोक सकते। इसलिए उन्होंने दोषी की मानसिक स्थिति का आकलन न कराए जाने और कोई सुधार परिलक्षित न होने की दलील दी। पर यह बाल की खाल निकालना था। मानसिक स्थिति का आकलन कराने की जरूरत के तर्क को उच्च न्यायालय पहले ही खारिज कर चुका था। कोई सुधार न दिखने की दलील पर सर्वोच्च अदालत ने सवाल किया कि अगर अगले सात-आठ साल तक कोई सुधार नजर न आए, तो क्या तब तक रिहाई रोकी जाती रहेगी? कानूनी विशेषज्ञों ने हाइकोर्ट के फैसले को भी सही ठहराया है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी। अलबत्ता यह मांग और तेज हुई है कि किशोर न्याय कानून में बदलाव हो। इसकी पहल हो चुकी है। हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराध के मामलों में किशोर उम्र की सीमा अठारह वर्ष से घटा कर सोलह वर्ष करने के लिए लाया गया विधेयक मई में लोकसभा से पारित हो चुका है, पर राज्यसभा में अटका है। इस विधेयक को कानून की मंजिल तक ले जाना जरूरी है, क्योंकि नाबालिगों के अपराध बढ़े हैं, संगीन मामलों में उनकी संलिप्तता भी बढ़ी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। मगर नाबालिगों के अपराधों में बढ़ोतरी पर सिर्फ कानून के नजरिए से नहीं, समाज-सुधार के तकाजे से भी विचार किया जाना चाहिए।

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