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संपादकीयः बिजली के वाहन

भारत के शहरों और महानगरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा विषय है जिस पर सालों से गंभीर चिंता तो जताई जा रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी ठोस काम होता नजर नहीं आया है।

भारत के शहरों और महानगरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा विषय है जिस पर सालों से गंभीर चिंता तो जताई जा रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी ठोस काम होता नजर नहीं आया है। ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बनी है जो वाहन प्रदूषण की समस्या से निपटने का समाधान बताती हो। इसका नतीजा यह है कि देश में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और रोजाना नए लाखों वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। लेकिन इन पर लगाम कैसे लगे, इसका कोई समाधान सरकार के पास नहीं है। आज देश भर में करोड़ों वाहन हैं जो पेट्रोल और डीजल से चल रहे हैं और इनसे निकलने वाला धुआं कार्बन उर्त्सजन का बड़ा कारण है। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए नीति आयोग ने दो दिन तक बिजली से चलने वाले वाहनों की जरूरत, उनके निर्माण और इससे संबंधित जरूरी नीतियां बनाने के मकसद से वैश्विक सम्मेलन किया। इसमें दुनिया की कई जानीमानी वाहन निर्माता कंपनियों ने शिरकत की। ‘ग्लोबल मोबिलिटी समिट-मूव’ से यह उम्मीद तो बंधी है कि आने वाले वक्त में भारत बिजली से चलने वाले वाहनों के निर्माण को लेकर पहल करेगा।

प्रधानमंत्री ने बिजली चालित वाहनों के लिए बैटरी से लेकर उनके कलपुर्जे तक भारत में बनाने पर जोर दिया। यह भारत की तात्कालिक जरूरत भी है, क्योंकि जितनी जल्दी पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से मुक्ति पाई जा सके, उतना ही अच्छा है। लेकिन हकीकत यह है कि हम इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ पाए हैं। जबकि दुनिया के दूसरे देश बिजली चालित वाहनों के इस्तेमाल में काफी आगे निकल चुके हैं। भारत में अभी किसी भी वाहन निर्माता कंपनी ने व्यावसायिक स्तर पर इसकी शुरुआत नहीं की है। इसके लिए जिम्मेदार खुद सरकार ही है। भारत में बिजली और वैकल्पिक र्इंधन से चलने वाले वाहनों के लिए अभी तक कोई नीति नहीं है। हालांकि सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने जल्द ही ऐसी नीति बनाने का भरोसा तो दिया है। लेकिन सवाल है कि कब नीति बनेगी, कैसे उस पर अमल होगा, इसके लिए अभी इंतजार ही करना होगा। तब तक समस्या और गंभीर हो चुकी होगी।

बिजली चालित वाहनों का सपना इसलिए भी साकार नहीं हो पाया है क्योंकि हमारे यहां उसके लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बिजली चालित वाहन बाजार में उतारे जा सकते हैं। जाहिर है, कंपनियां तो तैयार हैं, लेकिन पहल सरकार को करनी है। बुनियादी सुविधाओं का बंदोबस्त सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की जरूरत है। बिजली चालित वाहनों के लिए जो नीति बने उसमें सार्वजनिक परिवहन को केंद्र में रखना होगा। जब तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी और पूरी तरह बिजली वाहनों पर आधारित नहीं होगी, तब तक इस दिशा में किए जाने वाले अपेक्षित नहीं देंगे। आज जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए तो लगता है भारत में बिजली चालित वाहनों की मंजिल अभी दूर है। सरकारों ने अगर इस समले को पहले से ही गंभीरता लिया होता और इस दिशा में पहल की होती तो भारत भी उन देशों की कतार में शामिल हो सकता है जो अब बिजली वाहनों का इस्तेमाल कर प्रदूषण से मुक्ति पाने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

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