चुनावी पालाबदल

चुनाव की घोषणा होते ही राजनेताओं के दल बदल की गहमागहमी भी शुरू हो जाती है।

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उत्‍तर प्रदेश विधानसभा।

चुनाव की घोषणा होते ही राजनेताओं के दल बदल की गहमागहमी भी शुरू हो जाती है। यह पिछले करीब डेढ़ दशक से कुछ अधिक देखा जाने लगा है। चुनाव में जिस राजनीतिक दल का पलड़ा भारी दिखता है, उसमें घुसने की होड़ कुछ अधिक देखी जाती है। पिछले आम चुनाव में भी यही हुआ था, जब भाजपा का पलड़ा भारी दिखने लगा और कांग्रेस की नैया डूबती जान पड़ने लगी तो कांग्रेस से पलायन कर नेताओं में भाजपा से जुड़ने की होड़ देखी गई थी। उसके बाद के तमाम विधानसभा चुनावों में भी ऐसा ही पालाबदल देखा गया।

बिहार में जैसे ही लगने लगा कि नीतीश कुमार सरकार की वापसी नहीं होगी और राजद की स्थिति मजबूत है, तो सत्तादल के कई नेता टूट कर राजद में जा मिले थे। ऐसी ही भगदड़ बंगाल विधानसभा चुनाव में भी देखी गई। तब भाजपा की स्थिति मजबूत नजर आ रही थी, इसलिए तृणमूल के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था। हालांकि नतीजे कयासों के विपरीत आए। वही स्थिति अब उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी में शामिल होने वाले नेता जैसे कतार लगा कर खड़े हो गए हैं।

चुनाव की घोषणा से पहले हुई चुनावी रैलियों के मद्देनजर कयास लगाए जा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी की स्थिति मजबूत है। विशेषज्ञों का आकलन है कि सपा सरकार भी बना सकती है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के असंतुष्ट नेता सपा से हाथ मिलाते देखे जा रहे हैं। भाजपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और कांग्रेस के इमरान मसूद के सपा में जा मिलने से प्रदेश के चुनावी गणित में बड़ा उलट-फेर होने की संभावना जताई जा रही है। इनसे पहले ओमप्रकाश राजभर आदि कई नेता, जो पहले भाजपा के साथ थे, अब सपा से जा मिले हैं।

अभी और कई नेताओं के सपा में आने के कयास लगाए जा रहे हैं। इस तरह चुनाव के वक्त नेताओं के पालाबदल से स्पष्ट हो गया है कि राजनीति में सिद्धांतों का कोई मतलब नहीं रह गया है। नेता किसी भी तरह इस या उस दल से सत्ता में बने रहना चाहते हैं। इससे राजनीतिक दलों का मकसद भी साफ है कि उनके लिए अपने कर्मठ और प्रतिबद्ध नेताओं के बजाय उन नेताओं की अहमियत ज्यादा है, जो उन्हें सरकार बनाने में सहायक साबित हो सकते हैं।

यह ठीक है कि हर राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए ही संघर्ष करता और अपने-अपने तरीके से चुनावी समीकरण साधने का प्रयास करता रहता है। यह अपने में बुरी बात भी नहीं है। मगर इस तरह दल बदल कर जीतने वाली पार्टी से गठजोड़ कर फिर सत्ता में पहुंचने के प्रयास आखिरकार मतदाता को ही छलते हैं। मतदाता किन्हीं मुद्दों के मद्देनजर मतदान का मानस बनाता है। जाहिर है, वह रुझान किसी दल के प्रति होता है।

ऐसे में उसने जिस दल को नकारने का मन बनाया होता है, अगर उसी दल का नेता जीतने वाली पार्टी में आकर चुनाव जीत जाता है, तो यह एक तरह से मतदाता के साथ धोखाधड़ी ही कही जाएगी। फिर दूसरे दलों से आए नेताओं को तरजीह देकर चुनाव जीतने का गणित हल करने वाली पार्टियां आखिरकार अपने सैकड़ों कर्मठ और प्रतिबद्ध नेताओं की मेहनत पर भी पानी फेर देती हैं, जिन्होंने वर्षों उसका जनाधार बनाने के लिए संघर्ष किया होता है? इसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक तरीका नहीं कहा जा सकता।

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