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संपादकीय: सियासी रसोई

जब चुनाव नजदीक आते हैं, तो सत्ताधारी दलों को आम लोगों की समस्याएं कुछ अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं या यों कहें कि तभी उन्हें उन समस्याओं का समाधान सूझता है।

Author Updated: February 17, 2021 9:45 AM
Mamtaसांकेतिक फोटो।

पश्चिम बंगाल में चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। सत्ताधारी तृणमूल में टूट-फूट भी शुरू हो गई है। उधर भाजपा ने आक्रामक ढंग से ममता बनर्जी सरकार की नाकामियां गिनानी शुरू कर दी हैं। स्वाभाविक ही तृणमूल में खलबली है। ऐसे में ममता बनर्जी को गरीबों के लिए पांच रुपए में भोजन उपलब्ध कराने का सूझा है।

दीदी ने ‘मायेर रान्ना’ यानी मां की रसोई नाम से यह योजना शुरू कर दी है। स्वाभाविक ही इस योजना को लेकर उन पर अंगुलियां उठनी शुरू हो गई हैं। हालांकि अभी आचार संहिता लागू नहीं है, इसलिए इस योजना को चुनौती नहीं दी जा सकती, मगर इसके पीछे की सियासत को समझना मुश्किल नहीं है। यों निम्न आयवर्ग और गरीबों को भोजन उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है, इसलिए इसमें कोई बुराई भी नहीं।

ऐसी योजनाएं अनेक राज्यों में चल रही हैं। दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार और तमिलनाडु में जयललिता ने भी शुरू की थी। कुछ राज्यों में दो रुपए किलो चावल देने की योजना है। मगर ऐसी योजनाएं जब ऐन चुनाव के समय शुरू की जाती हैं, तो उन पर सवाल उठते ही हैं। इस योजना के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने सौ करोड़ रुपए आबंटित किए हैं।

हालांकि यह अपने आप में कोई नई पहल नहीं है। चुनाव के वक्त किसानों की बिजली का बिल और दूसरे कर्ज माफ करने, स्कूली बच्चों को बस्ते और साइकिल आदि मुफ्त देने, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और पोषाहार उपलब्ध कराने, बड़े शहरों की अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों को नियमित करने आदि जैसे फैसले सरकारें करती रही हैं।

मगर जब भी इस तरह कर्ज माफी, मुफ्त या मामूली कीमत पर अन्न या भोजन उपलब्ध कराने जैसी योजनाएं चलाई जाती हैं, तो उन पर कई कारणों से सवाल उठने वाजिब जान पड़ते हैं। सरकारें इस तरह लोगों को तात्कालिक राहत तो जरूर पहुंचा देती हैं, पर मूल समस्या के समाधान का सवाल जस का तस बना रहता है।

भोजन जरूर आवश्यक चीज है और किसी भी नागरिक को भूख से न मरने देना आखिरकार सरकारों का दायित्व है, पर मुफ्त भोजन उपलब्ध कराना लोगों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। अगर लोगों को काम के अवसर उपलब्ध हों, तो उन्हें इस तरह मुफ्त या मामूली पैसे देकर भोजन करने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा।

बंगाल में गरीबी का स्तर चिंताजनक है। एक समय में वहां कल-कारखाने बहुत हुआ करते थे, जिनमें लोगों को काम मिल जाया करता था, मगर अब वे धीरे-धीरे उजड़ते गए हैं। इसलिए वहां से लोग पलायन कर देश के दूसरे बड़े शहरों में मजदूरी करने को विवश होते हैं। विडंबना है कि किसान-मजदूरों के हकों के लिए लड़ने वाले वामपंथी दल भी करीब तीस साल सत्ता में रहने के बावजूद इस समस्या का हल नहीं तलाश पाए। फिर ममता बनर्जी सरकार से उम्मीदें थीं, मगर वह भी उन पर खरी नहीं उतर पाई है।

लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने और आमदनी बढ़ाने के लिए कल-कारखानों, नए उद्यमों को बढ़ावा देना जरूरी होता है, मगर पश्चिम बंगाल सरकार उस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय केंद्र से टकराव में ही मुब्तिला अधिक नजर आई। अगर रोजगार के अवसर पैदा होते, तो शायद पांच रुपए में भोजन परोसने की योजना उसे न चलानी पड़ती।

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