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चुनाव का चक्र

प्रधामंत्री ने एक बार फिर एक राष्ट्र एक चुनाव के सिद्धांत पर बल दिया है।

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सांकेतिक फोटो।

प्रधामंत्री ने एक बार फिर एक राष्ट्र एक चुनाव के सिद्धांत पर बल दिया है। पहले भी कई मौकों पर वे कह चुके हैं कि देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने चाहिए। अलग-अलग चुनाव होने से धन और समय की बहुत बर्बादी होती है। प्रधानमंत्री के इस सिद्धांत का उपराष्ट्रपति ने भी समर्थन किया है। इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि बार-बार चुनाव होने से न सिर्फ पैसे की काफी बर्बादी होती है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया के प्रति मतदाता में उदासीनता भी पैदा होती है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं मानी जाती।

प्रधानमंत्री ने इस बिंदु का विशेष रूप से उल्लेख किया कि बहुत सारे पढ़े-लिखे शहरी मतदाता मतदान में उत्साह के साथ हिस्सा नहीं लेते। पिछले कुछ सालों से स्थिति कुछ ऐसी बन गई है कि हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं। इस तरह देश में हर समय चुनाव का माहौल बना रहता है। जिन राज्यों और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकारें हैं या कहीं वह प्रतिपक्षी दल के रूप में है, वहां जब विधानसभा के चुनाव होते हैं तो केंद्र सरकार भी सक्रिय नजर आती है। उसी के अनुसार कई बार फैसले भी करती देखी जाती है। इसी तरह राज्य सरकारें भी लोकसभा चुनाव के समय अपने दल को ध्यान में रख कर सरकारी तंत्र का उपयोग करती हैं। यह अब जैसे स्वीकृत परंपरा का रूप ले चुका है।

लोकतंत्र में चुनाव की अवधि तय होती है। हमारे संविधान में चुनाव को लेकर बहुत स्पष्ट प्रावधान हैं। पांच साल के भीतर चुनाव हो जाना चाहिए, चाहे वह लोकसभा का हो या विधानसभा का। आजादी के शुरुआती कुछ सालों में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाते थे। इससे राजनीतिक दलों को भी फायदा होता था और सरकारी अमले और मतदाता को भी बार-बार चुनाव की गहमागहमी से निजात मिलती थी।

मगर कुछ विधानसभाओं में सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पार्इं और कई बार लोकसभा के भी मध्यावधि चुनाव कराने पड़े, जिसकी वजह से एक साथ चुनाव कराने का चक्र बिगड़ गया। संवैधानिक बाध्यता है कि किसी भी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद किन्हीं स्थितियों में अगर चुनाव संपन्न नहीं कराए जा पाते, तो राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ता है। उसकी अवधि भी छह महीने होती है। इसे लंबे समय तक नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ कराने में बाधा आती है।

अब चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल जिस तरह के हथकंडे अपनाने लगे हैं, धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल करने लगे हैं। चुनावी हिंसा की घटनाएं भी लगातार बढ़ती गई हैं। राजनीतिक दलों के लोक-लुभावन वादों के अलावा जाति, धर्म आदि के समीकरण जिस तरह बनाए और फैलाए जाते हैं, उससे सामाजिक समरसता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। बार-बार चुनाव कराए जाने से लंबे समय तक सरकारों के कामकाज बाधित रहते हैं, क्योंकि सरकारी अमला चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी में जुट जाता है।

चुनावों पर होने वाला खर्च सरकारी खजाने पर बुरा असर डालता है, जिससे कई विकास परियोजनाओं के रास्ते में अवरोध पैदा होता है। इस तरह लोकतंत्र का उत्सव कहा जाने वाला चुनाव परेशानियों का सबब बन जाता है। इस लिहाज से साथ चुनाव कराना और पांच साल में एक बार चुनाव कराना सभी तरह से हितकारी साबित होगा। मगर प्रश्न है कि मध्यावधि चुनावों की स्थितियों से कैसे निपटा जा सकता है।

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