ECI SIR Controversy: एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन की दिशा तय करने और राष्ट्र निर्माण में आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने का अवसर भी होता है। इसलिए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए बेहद जरूरी है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इस जिम्मेदारी का प्रमुख संस्थागत दायित्व चुनाव आयोग के पास है। मगर जब इस संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आयोग के भीतर मतभेद और असहमति हाल ही में जिस रूप में सामने आई है, उसको लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भरोसे का संकट पैदा हो गया है।

विपक्ष इस मुद्दे पर हमलावर है और सत्तारूढ़ भाजपा बचाव की मुद्रा में है। मगर राजग के कुछ सहयोगी दलों के सुर अब अलग नजर आ रहे हैं। इस सब के बीच यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग खुद आगे आकर तमाम सवालों के संतोषजनक जवाब क्यों नहीं दे पा रहा है! खबरों के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस माह में निर्वाचन आयोग के फैसलों पर चौदह बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।

इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और फार्म-6 में बदलावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, यह पहली दफा नहीं है, जब आयोग के भीतर मतभेद सामने आए हैं, लेकिन इस बार असहमति का संबंध सीधे तौर पर मतदाताओं के अधिकार से जुड़ा है। यह विवाद ऐसे वक्त में उजागर हुआ है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की प्रक्रिया को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से शनिवार को बयान जारी कर कहा गया कि एसआइआर से जुड़े सभी आदेश आम सहमति से जारी किए गए थे और मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए फार्म-6 में किए गए बदलावों को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा है।

इससे पहले विपक्ष ने दावा किया था कि फार्म-6 में संशोधन करने की शक्ति सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। ऐसे में सवाल यह भी है कि फिर चुनाव आयोग ने क्यों और किस शक्ति का इस्तेमाल करके फार्म-6 में संशोधन किया? मतदाताओं को इसका स्पष्ट जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।

चुनाव आयोग के पक्ष में खड़ी भाजपा का तर्क है कि विचार-विमर्श के दौरान निर्वाचन आयुक्तों की ओर से अलग-अलग राय व्यक्त करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। मगर यहां सवाल वैचारिक मतभेदों का नहीं, बल्कि नियम-कानूनों से जुड़े प्रावधानों का है। जब कोई निर्णय मतदान के अधिकार से संबंधित हो, तो क्या मतदाताओं को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि इसकी जरूरत क्यों महसूस की गई?

पुनरीक्षण प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में जिस तरह से लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर किया गया और अब अपीलों पर सुनवाई के दौरान नब्बे फीसद से अधिक मतदाताओं की सूची में बहाली भी कई सवाल खड़े करती है। देश भर में अब तक एसआइआर के तहत तेरह करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

अगर सभी राज्यों में मतदाताओं की बहाली का यही अनुपात रहे, तो क्या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाएगा? लाखों की संख्या में जो पात्र मतदाता विधानसभा चुनावों में अपने मताधिकार से वंचित रह गए, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब चुनाव आयोग को ही देना होगा।

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