निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त एवं संवैधानिक संस्था है, जो चुनावी प्रक्रिया का संचालन करने के लिए उत्तरदायी है। यही वह संस्था है, जो लोकतंत्र के मूल तत्त्व को जिंदा बनाए रख सकती है। मगर पिछले कुछ वर्षों से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर जिस तरह से सवाल उठ रहे हैं, उससे उसकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई है।
दरअसल, कोई भी प्राधिकरण तभी स्वायत्त और निष्पक्ष हो सकता है, जब उस पर कोई बाहरी दबाव न हो और उसके पदाधिकारियों का चयन भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष तरीके से किया जाए। निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों को लेकर कई स्तर पर आरोप लगते रहे हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को इस मामले में कहा कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं और यह तभी सुनिश्चित किया जा सकता है, जब निर्वाचन आयोग स्वतंत्र हो और इसके कार्यों में स्वायत्तता प्रतीत भी हो।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में लागू किया गया मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 में यह प्रावधान है कि निर्वाचन आयोग में आयुक्तों की नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जाएंगी। इस समिति में पहले प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल थे, मगर नए कानून में प्रधान न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। शीर्ष अदालत में इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।
सवाल है कि तीन सदस्यीय चयन समिति में सरकार के दो प्रतिनिधि शामिल होने से क्या नियुक्ति प्रक्रिया में पूरी निष्पक्षता की उम्मीद की जा सकती है? स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है, ऐसे में अगर निर्वाचन आयोग की संरचना पर ही सवाल उठते रहे, तो जनता के भरोसे का क्या होगा।
इसी पहलू पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि विश्वास का स्तर इतना होना चाहिए कि ऐसा प्रतीत हो कि चयन समिति में कोई तीसरा निष्पक्ष व्यक्ति भी शामिल है। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी से निर्वाचन आयोग में नियुक्ति प्रक्रिया को संतुलित किए जाने की उम्मीद जगी है।
