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संपादकीय: लापरवाही के कारखाने

गाजियाबाद में मोदीनगर इलाके के बड़खवां गांव एक घर में मोमबत्ती और पटाखे बनाने की फैक्ट्री चल रही थी और आसपास के लोगों से लेकर प्रशासन तक को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा था। क्या इस तरह की लापरवाही ही कारखाने में हादसे की जड़ में नहीं है, जिसकी वजह से वक्त पर किसी को दखल देना जरूरी नहीं लगता है।

Author Published on: July 7, 2020 3:42 AM
Accident, Negligence, Modinagar Ghaziabadगाजियाबाद के मोदीनगर में रविवार को एक मोमबत्ती कारखाने में लगी आग में ऑठ लोगों की मौत हो गई थी।

गाजियाबाद में एक मोमबत्ती कारखाने में लगी आग और उसमें लोगों के मारे जाने की घटना ने एक बार फिर यही साबित किया है कि न तो ऐसे कारखाने चलाने वालों को कामगारों की जान की परवाह होती है, न शायद प्रशासन इसे कोई गंभीर समस्या मानता है। वरना क्या वजह है कि ऐसे ज्यादातर कारखाने नियम-कायदों को ताक पर रख कर चलाए जाते रहते हैं, लेकिन उन पर लोगों का ध्यान तब जाता है, जब वहां कोई बड़ा हादसा हो जाता है।

गाजियाबाद में मोदीनगर इलाके के बड़खवां गांव एक घर में मोमबत्ती और पटाखे बनाने की फैक्ट्री चल रही थी और आसपास के लोगों से लेकर प्रशासन तक को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा था। क्या इस तरह की लापरवाही ही कारखाने में हादसे की जड़ में नहीं है, जिसकी वजह से वक्त पर किसी को दखल देना जरूरी नहीं लगता है। गौरतलब है कि रविवार को दोपहर में अचानक ही उस फैक्ट्री में विस्फोट हुआ और फिर भयावह आग लग गई। उसमें फंसे लोगों में आठ की मौत झुलस जाने की वजह से हो गई, जबकि कई लोग बुरी तरह से घायल हो गए।

दरअसल, इस तरह के ज्यादातर हादसों की जड़ में जितना बड़ा कारण कारखाना मालिकों की लापरवाही और नियम-कायदों को धता बताना होता है, उससे ज्यादा ऐसे मामलों में प्रशासनिक अनदेखी को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। सवाल है कि गांव के रिहाइशी इलाके में कोई अधिकतम जोखिम वाला कारखाना कैसे चल रहा था, जबकि इसे अवैध माना जा रहा था! खबर के मुताबिक घटना के बीस दिन पहले इस अवैध फैक्ट्री पर छापा पड़ा था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अब जब वहां एक त्रासद हादसा हो चुका है तब अंदाजा लगाया जा सकता है कि आखिर प्रशासन ने छापे के बावजूद वहां पटाखा और मोमबत्ती बनाने का काम क्यों जारी रहने दिया होगा! यह बेवजह नहीं है कि घटना के बाद वहां गांव में लोगों के बीच सरकारी महकमों के खिलाफ काफी आक्रोश देखने में आया और लोगों ने प्रशासनिक अनदेखी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

अब मुआवजे और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और रासुका लगाने का आश्वासन देने की औपचारिकता न तो बरती गई लापरवाही का जवाब है, न मारे गए लोगों की जान की कीमत! जब सख्ती और चौकसी की जरूरत होती है, तब किसी को सक्रिय होना जरूरी नहीं लगता है और जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है तब संबंधित महकमों की नींद खुलती है।

ऐसा नहीं है कि इस तरह का यह कोई पहला हादसा है। दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अक्सर कारखानों में आग लगने की घटनाएं होती रहती हैं। लेकिन उनसे सबक लेकर ऐसी औद्योगिक इकाइयों में सख्ती से नियम-कायदों का पालन और अग्निशमन सहित किसी भी तरह की आपात स्थिति में सुरक्षा के इंतजामों को सुनिश्चित करना शायद ही कभी प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है। नतीजतन, अचानक ही आग लगने जैसी घटना के बाद व्यापक जान-माल का नुकसान होता है और वैसे लोग भी झुलस कर या धुएं में घुट कर मर जाते हैं, जिन्हें मामूली सुरक्षा इंतजाम करके बचाया जा सकता था।

आग लगने की स्थिति में ज्यादातर जगहों पर कामगारों की मौत की मुख्य वजह कारखाने में प्रवेश या निकास द्वार का बेहद संकरा होना, एक ही दरवाजा होना और कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं होना भी रही है। लेकिन बार-बार हादसों के उदाहरणों के बावजूद फैक्ट्रियां ऐसे चल रही हैं, जैसे उन्हें वहां काम करने वालों की जान की कोई फिक्र ही नहीं है। जाहिर है, जब तक ऐसे कारखानों की हर गतिविधि और सुरक्षा इंतजामों पर नजर रखने वाले संबंधित महकमों की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, हादसों में लोगों की जान जाती रहेगी।

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