महंगाई की मार

लगातार बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है।

सांकेतिक फोटो।

लगातार बढ़ती महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। शायद ही कोई ऐसी वस्तु हो, जो महंगाई के दायरे से बाहर नजर आ रही हो। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम पिछले कई महीनों से बढ़ ही रहे हैं। खाने-पीने के सामान से लेकर फल-सब्जियां और दूध तक महंगा हो गया है। इसका सबसे ज्यादा असर मध्यवर्ग से लेकर गरीब तबके तक पर साफ नजर आ रहा है। हालात जिस तरह के बने हुए हैं उससे तो लगता नहीं कि हाल-फिलहाल महंगाई से कोई राहत मिल पाएगी। जहां तक सवाल है पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ने का, तो इस मामले में सरकार पहले ही कह चुकी है कि यह विदेशी बाजार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ने का नतीजा है। ऐसे में उसके हाथ में कुछ नहीं है। जाहिर है, महंगाई अपनी रफ्तार से बढ़ेगी और आम आदमी को ही इसका बोझ ढोना होगा।

वैसे महंगाई बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए कोई खराब संकेत नहीं होता। महंगाई बढ़ने का एक मतलब यह भी है कि बाजार में मांग बढ़ रही है, इसलिए चीजें मंहगी हो रही हैं। लेकिन यह तब तक ही अच्छा है जब खर्च करने के लिए लोगों के हाथ में पैसा हो और अर्थव्यवस्था मजबूत हो। पर अभी हालात ऐसे तो हैं नहीं। लोग महामारी से पैदा हालात खासतौर से आर्थिक संकट से उबरे भी नहीं हैं। पिछले डेढ़ साल में उद्योगों और बाजार पर महामारी का काफी बुरा असर पड़ा है। करोड़ों लोगों का कामधंधा चौपट हो गया। आमदनी में भारी गिरावट आई है।

असंगठित क्षेत्र का हाल तो और बुरा है। रोज कमाने-खाने वाले तबके के हालात कहीं ज्यादा चिंताजनक हैं। अभी भी लाखों लोगों के पास रोजगार नहीं है। ऐसे में लोगों के पास खर्च करने को पैसा आएगा कहां से? चिंता की बात इसलिए भी है कि भारत में महंगाई बिना मांग के बढ़ रही है। पूर्णबंदी के बाद शुरू हुए उद्योगों ने अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके पीछे तर्क उत्पादन लागत बढ़ने से ढुलाई तक के खर्च बढ़ने का दिया गया। इसके साथ ही पेट्रोल, डीजल के दाम तो लगातार बढ़ ही रहे हैं। देश के ज्यादातर शहरों में पेट्रोल एक सौ दस और डीजल सौ रुपए से ऊपर बिक रहा है। ऐसे में ढुलाई भी महंगी होती जा रही है। इसलिए हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं।

सवाल है कि महंगाई से राहत कैसे मिले? ऐसा नहीं है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए सरकार के पास कोई उपाय बचे नहीं हैं। लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल और डीजल पर वसूले जाने करों को घटाएं। इससे इन उत्पादों के दाम नीचे आएंगे और फिर हर चीज के दाम पर उसका असर दिखना शुरू होगा। महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक पहले ही चिंता जता चुका है और वह भी सरकार को पेट्रोल, डीजल पर लगने वाले करों में कटौती का सुझाव दे चुका है। हाल में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने भी पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले करों में कटौती की जरूरत बताई है। हालांकि सरकार का तर्क है कि पेट्रोल-डीजल पर वसूले जा रहे करों से जो पैसा आ रहा है उसी से गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं। लेकिन सवाल है कि अभी लोगों को महंगाई की और मार से कैसे बचाया जाए? आम लोगों पर महंगाई की मार के दूरगामी असर होते हैं, जो उन्हें गरीबी की ओर धकेलते हैं। इसलिए महंगाई काबू करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, जो फिलहाल नजर आ नहीं रही।

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