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संपादकीय: महामारी में पढ़ाई

बंदी खुलने के बाद बाजारों में कारोबारी गतिविधियां शुरू हो गई हैं। लोग रोजमर्रा की चीजें खरीदने जाने लगे हैं। शॉपिंग मॉल, दफ्तर, बसें आदि शुरू हो चुकी हैं। सब जगह लोग सावधानी बरतते हुए अपने जरूरी काम निपटा रहे हैं। हालांकि स्कूलों को नियमित तौर पर खोलना जोखिम भरा काम है, इसलिए उन्हें बंद रखने का फैसला किया गया है।

कोरोना की वजह से पढ़ाई-लिखाई पर विपरीत असर पड़ रहा है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं और परीक्षाएं भी नहीं हो सकी हैं।

इस महामारी ने आदमी को हर समय एक अजीब तरह की आशंका के माहौल में डाल दिया है। कोरोना संक्रमण का भय लगातार बना हुआ है। ऐसे में जीवन के रोजमर्रा कामकाज भी प्रभावित हुए हैं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बाधित हुई है। स्कूल बंद हैं, पर पढ़ाई का सत्र बर्बाद न जाए, इसलिए घर बैठे आॅनलाइन पढ़ाई कराने का प्रयास हो रहा है। जब दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं अभी कुछ बची हुई थीं, तभी कोरोना संकट के चलते देश में पूर्णबंदी लागू करनी पड़ी। इसलिए उनके नतीजे तैयार करने में काफी मुश्किलें आईं। फिर तमाम विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में दाखिले की प्रक्रिया इसलिए रुक गई कि उनकी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराने मेें संक्रमण का खतरा था।

बहुत सारे लोग इसके पक्ष में नहीं थे। ऐसे में विद्यार्थियों की पढ़ाई का पूरा साल बर्बाद होने चिंता पैदा हो गई, इसलिए यह मामला अदालत में गया। उस पर सर्वोच्च न्यायालय ने इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं को हरी झंडी दे दी है। अदालत ने कहा कि यह संकट पता नहीं कब तक चलेगा, पर इससे जीवन को नहीं रोका जा सकता। सुरक्षा उपायों का सहारा लेते हुए बच्चों के दाखिले की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। अब राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने इन प्रवेश परीक्षाओं की तारीखें भी घोषित कर दी हैं। पर फिर भी कुछ लोगों को इसमें खतरा नजर आ रहा है।

यह सही है कि एक जगह बहुत सारे लोगों के इकट्ठा होने से कोरोना संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। अभी इस महामारी पर काबू पाना चुनौती भी बना हुआ है। इसलिए कई लोगों का कहना है कि परीक्षा केंद्रों पर बच्चों और अभिभावकों की भीड़ बढ़ने से सामाजिक दूरी के पालन का नियम भंग हो सकता है। जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक प्रवेश परीक्षाएं टाल दी जानी चाहिए।

पर बच्चों के भविष्य को देखते हुए ऐसा कदम उठाना उचित नहीं होता। देखने की बात है कि इस बीच बंदी खुलने के बाद बाजारों में कारोबारी गतिविधियां शुरू हो गई हैं। लोग रोजमर्रा की चीजें खरीदने जाने लगे हैं। शॉपिंग मॉल, दफ्तर, बसें आदि शुरू हो चुकी हैं। सब जगह लोग सावधानी बरतते हुए अपने जरूरी काम निपटा रहे हैं। हालांकि स्कूलों को नियमित तौर पर खोलना जोखिम भरा काम है, इसलिए उन्हें बंद रखने का फैसला किया गया है। पर प्रवेश परीक्षाओं को स्कूली गतिविधियों से जोड़ कर बिल्कुल नहीं देखा जा सकता।

इंजीनियरिंग और मेडिकल, यहां तक कि बहुत सारे विश्वविद्यालयों की प्रवेश परीक्षाएं राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए आयोजित कराती है। इसके लिए तय केंद्र हैं। वहां कंप्यूटरीकृत परीक्षाएं होती हैं। इसलिए विद्यार्थियों के बीच दूरी बनाए रखने में कोई दिक्कत नहीं है। सेनेटाइजर, मास्क आदि जैसे एहतियाती उपायों का उपयोग करते हुए परीक्षा देने में बच्चों को कोई खतरा नहीं होना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम स्थितियों पर विचार करते हुए ही ये परीक्षाएं आयोजित करने की इजाजत दी है। प्रवेश परीक्षाओं के टलने का मतलब है, विद्यार्थियों की पढ़ाई-लिखाई का एक साल बर्बाद होना। पहले ही इस सत्र का काफी समय जाया हो चुका है। जब एहतियाती उपायों का उपयोग करते हुए पंद्रह अगस्त का समारोह हो सकता है, शादी-विवाह जैसे कार्यक्रम हो रहे हैं, कल-कारखानों, सरकारी परियोजनाओं में काम चलने लगा है, तो प्रवेश परीक्षाओं के मामले में रोक की कोई तुक नहीं थी। इस फैसले से दूसरी प्रवेश परीक्षाओं का भी रास्ता खुल गया है।

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