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श्रीलंका के साथ

श्रीलंका के विदेश मंत्री मंगला समरवीरा की भारत यात्रा का सबसे बड़ा हासिल यही है कि तमिल शरणार्थियों की वतन वापसी को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुला है। इस महीने के अंत तक बातचीत के लिए बैठक आयोजित हो जाएगी। हालांकि महिंदा राजपक्षे के समय भारत की ओर से इस मामले […]

Author January 20, 2015 2:24 PM
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श्रीलंका के विदेश मंत्री मंगला समरवीरा की भारत यात्रा का सबसे बड़ा हासिल यही है कि तमिल शरणार्थियों की वतन वापसी को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुला है। इस महीने के अंत तक बातचीत के लिए बैठक आयोजित हो जाएगी। हालांकि महिंदा राजपक्षे के समय भारत की ओर से इस मामले में बातचीत के जरिए व्यावहारिक उपाय जुटाने के कई बार प्रयास हुए, मगर तत्कालीन श्रीलंका सरकार की तरफ से गंभीरता न दिखाए जाने के चलते कोई नतीजा नहीं निकल सका। ताजा चुनाव के बाद मैत्रीपाल सिरीसेना के नेतृत्व में नई सरकार आई, तो उसने सबसे पहले तमिलों के अधिकारों की रक्षा, भूमि संबंधी अधिकारों का निर्धारण और शासन-व्यवस्था सेना के बजाय पुलिस को सौंपे जाने आदि संबंधी मुद्दों पर सौ दिनों के भीतर फैसला करने का वादा किया।

उस दिशा में उसने कदम भी बढ़ा दिया है, जिसका परिणाम सरकार बनने के हफ्ते भर के भीतर वहां के विदेश मंत्री का सबसे पहले भारत के दौरे पर आना और शरणार्थी तमिलों के हितों पर बातचीत करना है। श्रीलंका में तमिल आबादी करीब तेरह फीसद है, मगर उसे बुनियादी अधिकारों से लगातार वंचित रखा गया है। पहली बार महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व में सरकार बनी तो लिट््टे का सफाया कर गृहयुद्ध की स्थिति से पार पाने के बाद उसने तमिल समुदाय के हक लौटाने का वादा किया था। मगर हुआ इसके उलट। तमिलों के अधिकारों का हनन जारी रहा, सेना ने उनके खेत-खलिहान-बगीचों पर कब्जा कर लिया, न तो उन्हें शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई गई और न वहां की नौकरियों में उनके लिए जगह बनाई गई। अगर वे अपने हक के लिए आवाज उठाते तो सेना के दमन का शिकार होना पड़ता। इसके चलते तमिलों के भारत में शरण लेने की दर काफी तेजी से बढ़ी। अनुमान है कि इस समय करीब एक लाख श्रीलंकाई तमिल भारत में शरण लिए हुए हैं।

तमिल शरणार्थियों की वतन वापसी को लेकर श्रीलंका की नई सरकार की गंभीरता इसी से जाहिर होती है कि मंगला समरवीरा विदेशमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद सबसे पहले भारत आए और अपनी तरफ से इस मुद्दे पर रणनीति सुझाई। भारत सरकार ने स्वाभाविक रूप से इसे अच्छा अवसर मानते हुए तुरंत बातचीत आगे बढ़ाने का खाका तैयार कर दिया है। दरअसल, तमिल शरणार्थियों को उनके वतन वापस लौटाने की अनुकूल स्थितियां बनाने, उनके घर-बार वापस दिलाने और बुनियादी अधिकार सुनिश्चित कराने में भारत की भूमिका केवल इसलिए जरूरी नहीं है कि उनसे भावनात्मक लगाव है। बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय में मानवाधिकारों की रक्षा का संकल्प भी इससे पूरा होता है।

फिर श्रीलंका से दोस्ती भारत के लिए कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। सार्क देशों के बीच व्यापारिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भारत की प्राथमिकता है। फिर चीन की विस्तारवादी रणनीति को कुंद करने में भी श्रीलंका के साथ रिश्ते बेहतर बनाना जरूरी है। तमिल शरणार्थियों की वापसी के लिए दोनों देशों का मिल कर प्रयास करना इस दिशा में बड़ी उपलब्धि है। श्रीलंका ने अपनी ओर से भारतीय मछुआरों की रिहाई और उनकी बंधक नावों को लौटाने का फैसला किया है।

इससे सिरीसेना सरकार का भारत के प्रति लगाव जाहिर होता है। अब सिरीसेना सरकार के सामने बड़ी चुनौती तमिलों को उनके बुनियादी अधिकार लौटाने की है। वहां के सिंहली समुदाय इसके विरोध में लगातार आवाज उठाते रहे हैं। देखना है कि वे इससे किस तरह निपटते हैं। सेना के अधिकार वापस लेने का उनका इरादा निस्संदेह इस दिशा में सकारात्मक नतीजे की उम्मीद जगाता है। ऐसे में उसको भारत सरकार का गर्मजोशी से समर्थन मिलना चाहिए।

 

 

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