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सार्क की राह

एक समय लग रहा था कि सार्क का अठारहवां शिखर सम्मेलन भारत और पाकिस्तान के आपसी तनाव की भेंट चढ़ जाएगा। लेकिन दो दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ गर्मजोशी से मिले, और औपचारिक ही सही, कुछ पल बातचीत भी की। निश्चय हीइसका श्रेय मेजबान […]

एक समय लग रहा था कि सार्क का अठारहवां शिखर सम्मेलन भारत और पाकिस्तान के आपसी तनाव की भेंट चढ़ जाएगा। लेकिन दो दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ गर्मजोशी से मिले, और औपचारिक ही सही, कुछ पल बातचीत भी की। निश्चय हीइसका श्रेय मेजबान देश के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को जाता है जो मोदी और शरीफ को एक दूसरे के प्रति बेरुखी का रवैया छोड़ने के लिए मनाने में जुटे थे। इसका नतीजा न सिर्फ मोदी और शरीफ की मुलाकात में हुआ बल्कि सम्मेलन पूरी तरह नाकाम होने से बच गया। गुरुवार को सार्क देशों के बीच बिजली व्यापार के समझौते पर हस्ताक्षर हुए और साझा घोषणापत्र भी जारी हुआ। लेकिन दो अन्य अहम प्रस्तावित समझौते टाल देने पड़े, क्योंकि पाकिस्तान उनके लिए राजी नहीं था। कोइराला समेत सार्क नेताओं ने काठमांडो की शिखर बैठक को कामयाब बताया है। लेकिन इस सम्मेलन की उपलब्धि लाज बचाने भर की कवायद ही कही जा सकती है।

ऊर्जा करार के मुताबिक सार्क देशों के बीच ग्रिड के जरिए बिजली का व्यापार किया जा सकेगा। लेकिन पाकिस्तान के विरोध के चलते इन देशों के बीच मोटर वाहनों के आवागमन और रेल नेटवर्क संबंधी समझौते नहीं हो सके। यों पाकिस्तान ने पहले बिजली करार का भी विरोध किया था, यह कहते हुए कि इसके लिए अभी उसके यहां आंतरिक कार्रवाई नहीं हुई है। मगर नवाज आखिरी क्षणों में तैयार हो गए। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच तनातनी का आलम न होता तो क्या पता परिवहन संबंधी समझौते भी मूर्त रूप ग्रहण कर पाते। काठमांडो का यह सम्मेलन पहला नहीं था जिसमें भारत और पाकिस्तान को मनाने में सार्क की ऊर्जा का अपव्यय हुआ हो। अठारह में से ज्यादातर सम्मेलन दोनों देशों के आपसी तनाव की छाया में हुए हैं। काठमांडो बैठक को अपने एजेंडे से काफी कम पर संतोष करना पड़ा तो बेशक इसके लिए पाकिस्तान की अड़ंगेबाजी कसूरवार है। मगर मोदी ने सम्मेलन के आधे समय नवाज शरीफ के प्रति जो बेरुखी प्रदर्शित की, उसका भी कोई औचित्य नहीं था। यह सही है कि छह साल पहले मुंबई में हुए आतंकवादी हमले को भारत भूल नहीं सकता। लेकिन मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के आमंत्रित राष्ट्राध्यक्षों में शरीफ भी थे और उस मौके पर दोनों नेताओं ने बातचीत भी की और मीडिया के सामने मुस्कराहट भी बिखेरी। फिर, काठमांडो में दुराव प्रदर्शित करने का क्या मतलब था!

निश्चय ही सार्क की शिखर बैठकों में आतंकवाद का मुद््दा उठना चाहिए, जैसा कि पहले कई बार हुआ भी है। पर सार्क द्विपक्षीय मंच नहीं है, इसलिए भारत और पाकिस्तान को एक- दूसरे के प्रति अपनी खटास निकालने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। काठमांडो में जो हुआ वैसी ही गलती अमेरिका और यूरोपीय नेताओं ने जी-20 के ब्रिसबेन सम्मेलन में की थी। वे यूक्रेन के अलगाववादियों को रूस की तरफ से मिल रही मदद का मुद््दा उठा कर पुतिन को घेरने में जुटे रहे। लेकिन यूक्रेन या दक्षिण चीन सागर जैसे विवादों को सुलझाने के लिए जी-20 नहीं है। इसके लिए उपयुक्त मंच संयुक्त राष्ट्र है। यही बात सार्क के संबंध में भी कही जा सकती है कि यह इसके सदस्य देशों के आपसी मामलों को तूल देने की जगह नहीं है। सार्क के पहले के सम्मेलनों में पारित अनेक प्रस्ताव बरसों बाद भी अधर में हैं। मसलन, सार्क विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में कुछ भी प्रगति नहीं हो सकी है। अब तक के कामकाज की समीक्षा होनी चाहिए थी। सार्क के काठमांडो घोषणापत्र में क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत बनाने की वकालत की गई है। पर यह तभी हो सकता है जब सार्क में सामूहिकता की संस्कृति विकसित हो।

 

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