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सुधार की राह

भाजपा के सत्ता में आने की आहट से ही आर्थिक सुधार की उम्मीद परवान चढ़ने लगी थी। मोदी सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाए हैं। मसलन, मेक इन इंडिया नाम से विनिर्माण की नई नीति घोषित की है। कोयला खदानों के आबंटन और गैस मूल्य निर्धारण को लेकर चली आ रही अनिश्चितता […]

Author November 24, 2014 9:42 AM

भाजपा के सत्ता में आने की आहट से ही आर्थिक सुधार की उम्मीद परवान चढ़ने लगी थी। मोदी सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाए हैं। मसलन, मेक इन इंडिया नाम से विनिर्माण की नई नीति घोषित की है। कोयला खदानों के आबंटन और गैस मूल्य निर्धारण को लेकर चली आ रही अनिश्चितता की स्थिति समाप्त की है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक बार आर्थिक सुधारों के प्रति अपनी सरकार की वचनबद्धता का इजहार करते हुए पिछले हफ्ते एक मीडिया घराने की ओर से आयोजित परिचर्चा में कहा कि उनकी सरकार जल्द ही आर्थिक सुधार के कुछ अहम कदम उठाएगी। इनमें बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने, कोयला आबंटन के नए नियम तय करने और वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित विधेयक शामिल हैं। जेटली ने ये विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने का इरादा जताया है। चूंकि लोकसभा में भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल है, इसलिए कर प्रणाली से संबंधित प्रस्ताव पास कराने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन यही बात दूसरे मामलों में नहीं कही जा सकती। बीमा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा बढ़ाने का मसला शुरू से विवादास्पद रहा है। फिर, जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर लागू करने की योजना को लेकर अनेक राज्य अब भी सशंकित हैं। उन्हें लगता है कि प्रस्तावित कर प्रणाली से उनके राजस्व में कमी आ सकती है। ऐसे में फिलहाल कहना मुश्किल है कि जीएसटी कब लागू हो सकेगा।

जेटली चाहते हैं कि मध्यवर्ग पर ज्यादा बोझ न डाला जाए, ताकि इस वर्ग के लोग ज्यादा से ज्यादा खर्च करें और बाजार में तेजी आए। लेकिन इसी के साथ उन्होंने कर-आधार बढ़ाने की बात भी कही है। देखना है कि मध्यवर्ग को करों में राहत और कर-आधार में बढ़ोतरी का पेच वे कैसे सुलझाते हैं। यह अच्छी बात है कि उन्होंने कर-चोरी करने वालों को हरगिज न बख्शने की बात कही है। सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क जैसे परोक्ष करों की वसूली अपेक्षित मात्रा से किस हद तक कम होती है, यह वित्त मंत्रालय से बेहतर कौन जानता होगा। सबसे बड़ी लूट बैंकों के कर्जों के जरिए होती है। बैंक अनेक बड़े बकायेदारों से वसूली नहीं कर पाते और कुछ साल बाद उस रकम को बट्टेखाते में डाल दिया जाता है, जिसे बैंकिंग शब्दावली में एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स कहते हैं। रिजर्व बैंक के मुताबिक एनपीए कुल बैंक-कर्जों के पांच फीसद तक पहुंच चुका है। कर्जों के पुनर्गठन के नाम पर भी बहुत-सी रकम एनपीए की श्रेणी में डाल दी जाती है। कर-चोरी को सख्ती से रोकने का इरादा जताने वाले वित्तमंत्री ने एनपीए की बाबत कड़ा संदेश क्यों नहीं दिया? अगर एनपीए के रूप में होने वाली लूट को सरकार बंद नहीं कर सकती, तो काले धन की समस्या से कैसे निपटेगी?

वित्तमंत्री ने कहा है कि कर-प्रणाली निवेशक-हितैषी बनाई जाएगी। पर इसी के साथ यह स्पष्ट होना चाहिए कि विभिन्न तबकों पर कर का भार कैसा होगा, किन्हें राहत मिलेगी और किन्हें अधिक अंशदान करना होगा। आखिर सरकार को अपने संसाधन भी बढ़ाने हैं; केवल सबके लिए लुभावन बातें करने से वह कैसे हो सकेगा? जेटली ने रसोई गैस का लाभ संपन्न तबके को न देने की वकालत करते हुए सबसिडी को अधिक तर्कसंगत बनाने की बात कही है। निश्चय ही ऐसा किया जाना चाहिए। अच्छा हो कि अमीरी रेखा खींची जाए, और इसके दायरे में आने वाले लोगों को किसी भी तरह की सबसिडी न मिले। आर्थिक सुधारों की बाबत बाजार-केंद्रित ढांचे में ही सोचा जाता है। आम लोगों को आर्थिक सुधारों का लाभ कैसे मिले, इस तकाजे से कब सोचा जाएगा!

 

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