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संपादकीयः चीन पर ठीकरा

फिर अमेरिका और चीन के बीच तनातनी नई नहीं है। कारोबार और सामरिक ताकत के मामले में चीन हमेशा अमेरिका को चुनौती देता आया है। वैश्विक मामलों में जहां चौधराहट का मौका आता है, वहां दोनों हमेशा दो ध्रुव होते हैं।

अमेरिका एक बार फिर दुनिया भर में कोरोना विषाणु फैलाने का ठीकरा चीन पर फोड़ने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका एक बार फिर दुनिया भर में कोरोना विषाणु फैलाने का ठीकरा चीन पर फोड़ने की कोशिश कर रहा है। वहां के नौ सीनेटरों ने कोविड-19 जवाबदेही अधियनियम पेश किया है। अगर यह अधिनियम पारित हो जाता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति को चीन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिल जाएगा। इसके अलावा अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी कहा है कि बीते बीस सालों में चीन की वजह से दुनिया में पांच महामारियां आ चुकी हैं, इसलिए उस पर अंकुश लगाना जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति अनेक मौकों पर कह चुके हैं कि कोरोना विषाणु फैलाने के लिए चीन जिम्मेदार है और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। वे विश्व स्वास्थ्य संगठन पर भी दोष मढ़ चुके हैं कि उसने चीन का साथ दिया और कोरोना संक्रमण को लेकर जानकारियां छिपाए रखा। अगर उसने समय रहते इस महामारी के बारे में चेतावनी जारी कर दी होती, तो दुनिया में इतना बड़ा नुकसान नहीं होने पाता। इस क्रम में अमेरिका अपने हिस्से की विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाली मदद भी रोक चुका है। नौ सांसदों की तरफ से लाया गया नया विधेयक भी अमेरिकी प्रशासन की उसी कवायद की एक और कड़ी है।

हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि कोविड-19 विषाणु स्वत: पैदा हुआ है या फिर उसे किसी प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। पर कई लोगों का कयास है कि यह मानव निर्मित है और चीन के वुहान शहर की ही किसी प्रयोगशाला से फैलना शुरू हुआ है। अगर चीन ने समय रहते इससे जुड़ी जानकारियां साझा कर दी होती, वुहान से आवाजाही रोक दी होती, तो यह इतने बड़े पैमाने पर न फैलने पाता। मगर चीन लगातार इन कयासों और दावों का खंडन करता रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी फिलहाल इसका दावा नहीं करता कि यह वायरस स्वत: पैदा हुआ या बनाया गया। हालांकि इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि इस विषाणु के संक्रमण की रोकथाम के मामले में मुस्तैदी दिखाई गई होती, तो यह महामारी का रूप नहीं लेने पाता। अमेरिका की नाराजगी समझी जा सकती है। इस विषाणु से सबसे अधिक वही प्रभावित हुआ है। वह अपने लाखों लोगों को खो चुका है। उसकी अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। वहां के युवकों को लंबे समय तक बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ सकती है। राष्ट्रपति चुनाव नजदीक हैं और उसमें ये सारे मुद्दे निर्णायक रूप से उठेंगे। सो, डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पार्टी के माथे पर पड़े बल को समझना मुश्किल नहीं है।

फिर अमेरिका और चीन के बीच तनातनी नई नहीं है। कारोबार और सामरिक ताकत के मामले में चीन हमेशा अमेरिका को चुनौती देता आया है। वैश्विक मामलों में जहां चौधराहट का मौका आता है, वहां दोनों हमेशा दो ध्रुव होते हैं। इसलिए भी वुहान शहर से फैले संक्रमण के तथ्य और अमेरिका पर पड़ रही इसकी बुरी मार चीन के खिलाफ उसके तल्ख तेवर के लिए काफी हैं। पर चीन पर प्रतिबंध लगाने का वैधानिक आधार जुटाने का उसका प्रयास सिर्फ अपनी झुंझलाहट मिटाने के लिए नहीं है। इस तरह वह दुनिया भर में चीन के कारोबार को रोक कर उस पर अपना कब्जा भी जमाना चाहता है। मगर इस वक्त जब पूरी दुनिया के बाजार ठप पड़े हैं, अमेरिका को उनमें कितनी जगह मिल पाएगी, कहना मुश्किल है। पर दोनों की इस तनातनी का बुरा असर पूरी दुनिया पर जरूर दिखने लगेगा।

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