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जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस बार भारत के प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर पहले से कहीं अधिक उत्सुकता थी। इसलिए कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी पहली बार अमेरिका गए थे और महासभा को संबोधित करने का यह उनका पहला मौका था। उनसे एक रोज पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज […]

Author September 29, 2014 11:16 am

जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस बार भारत के प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर पहले से कहीं अधिक उत्सुकता थी। इसलिए कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी पहली बार अमेरिका गए थे और महासभा को संबोधित करने का यह उनका पहला मौका था। उनसे एक रोज पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ महासभा से मुखातिब हुए थे। जैसा कि लगभग हर बार होता आया है, इस बार भी पाकिस्तान ने कश्मीर-विवाद को अंतरराष्ट्रीय मसला बनाने की कोशिश की और भारत ने उसे नाकाम करने की। पर मोदी ने सख्त रुख अपनाते हुए भी अपने जवाब में संयम बरता। अपने आधे घंटे के भाषण में पाकिस्तान को जवाब देने के लिए सिर्फ दो-तीन मिनट लगाए। उन्होंने कहा कि भारत सभी द्विपक्षीय मसलों पर पाकिस्तान से बातचीत को तैयार है, पर बातचीत हिंसा या आतंकवाद के साए में नहीं हो सकती। साथ ही मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ एक वैश्विक करार की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए विश्व बिरादरी का आह्वान किया, ताकि कोई अच्छे और बुरे आतंकवाद का फर्क न कर सके। इस पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा से बेहतर मंच और क्या हो सकता है! संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर मानवाधिकारों तक अनेक मुद््दों पर घोषणापत्र समय-समय पर जारी किए हैं, उन पर तमाम देशों ने हस्ताक्षर भी किए हैं। अगर घोषणापत्र जारी होने से ही फर्क पड़ना होता, तो दुनिया की हालत कुछ और होती।

अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी गठबंधन में पाकिस्तान शामिल रहा है, पर उसके रवैए को लेकर भारत का अनुभव कैसा है यह सबको मालूम है। आज सऊदी अरब आइएसआइएस के खिलाफ अमेरिकी मुहिम में साझीदार है, पर वहाबी विचारधारा को पालने-पोसने और कई आतंकवादी गुटों को मदद पहुंचाने में उसकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक करार एक जवाबदेही का एलान जरूर करा सकता है, पर संजीदगी न हो तो वह महज सैद्धांतिक सहमति होकर रह जाएगा। महासभा का ताजा अधिवेशन ऐसे समय हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र को सहस्राब्दी विकास-लक्ष्यों के बाद का खाका बनाना है। लेकिन पहले सहस्राब्दी कार्यक्रम की खामियों पर विचार होना चाहिए, जिसके लक्ष्यों के 2015 तक की निर्धारित अवधि में पूरे होने की कोई सूरत नहीं दिखती। इस कार्यक्रम के तहत विकसित देशों ने मदद जरूर दी, पर अधिकांश वित्तीय सहायता के साथ तरह-तरह शर्तें जोड़ दी गर्इं, हथियार खरीदने का दबाव भी बनाया गया। क्या 2015 के बाद की विकास-योजना इस सब से मुक्त होगी?

सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन और उसमें स्थायी सदस्यता की भारत की अपेक्षा नई नहीं है। पर संयुक्त राष्ट्र के ढांचे और कार्यप्रणाली में सुधार के तकाजे का दायरा और बड़ा है। मोदी ने जी-4, जी-20, जी-7 जैसे समूहों के औचित्य पर सवाल उठाते हुए जी-आॅल यानी सभी को साथ लेने की बात कही। फिर उन्होंने वीटो खत्म करने की मांग क्यों नहीं उठाई? भारत खुद कई समूहों का हिस्सा है। उसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन और जी-77 जैसे समूहों के गठन और संचालन में अहम भूमिका निभाई। दरअसल, सभी देशों के हित समान नहीं हैं न सबकी विश्व-दृष्टि एक जैसी है। ऐसे में देशों का कोई समूह न बने, यह कैसे हो सकता है! अटल बिहारी वाजपेयी के बाद मोदी दूसरे प्रधानमंत्री हैं जो संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में बोले। अच्छी बात है। पर हिंदी को प्रतीकात्मक महत्त्व देने से आगे जाकर ऐसी भाषा नीति बनाने की जरूरत है जिससे शिक्षा, प्रशासन से लेकर अदालती कामकाज तक, तमाम क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा समाप्त की जा सके।

 

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