ताज़ा खबर
 

त्रासद शिविर

जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: मोतियाबिंद के आॅपरेशन, नसबंदी आदि के लिए होने वाले चिकित्सा शिविरों में अनेक लोगों के अपनी आंखें गंवा बैठने, अपंगता के शिकार होने या फिर जान से हाथ धो बैठने की घटनाएं जब-तब प्रकाश में आती रही हैं। इसके चलते ऐसे आयोजनों में चिकित्सीय संजीदगी की कमी का सवाल कई बार […]

Author November 12, 2014 1:31 PM

जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: मोतियाबिंद के आॅपरेशन, नसबंदी आदि के लिए होने वाले चिकित्सा शिविरों में अनेक लोगों के अपनी आंखें गंवा बैठने, अपंगता के शिकार होने या फिर जान से हाथ धो बैठने की घटनाएं जब-तब प्रकाश में आती रही हैं। इसके चलते ऐसे आयोजनों में चिकित्सीय संजीदगी की कमी का सवाल कई बार उठा है। पर इस दिशा में स्पष्ट और सख्त नियम-कायदे बनाने की पहल नहीं हुई। इसी का नतीजा एक और हादसे के रूप में सामने आया है। और भी गंभीर बात यह है कि ताजा हादसा सरकारी चिकित्सा शिविर में हुई लापरवाही की देन है। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से परिवार नियोजन अभियान के तहत बिलासपुर में आयोजित नसबंदी शिविर ने ग्यारह महिलाओं को मौत की नींद सुला दिया। तीस महिलाएं गंभीर रूप से बीमार हैं। गौरतलब है कि यह शिविर राज्य के स्वास्थ्यमंत्री के गृह-जिले में आयोजित था। प्रशासन का दावा है कि इसमें वहां के एक वरिष्ठ शल्य चिकित्सक और उनके योग्य सहयोगी तैनात किए गए थे। नसबंदी के लिए बिलासपुर के आसपास के गांवों से तिरासी महिलाओं को चुना गया था।

ज्यादातर बेहद गरीब परिवारों से थीं। घटना के बाद खुद बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि पांच घंटे के भीतर नसबंदी कर इन सभी महिलाओं को घर भेज दिया गया था। समझना मुश्किल नहीं है कि इतने कम समय में तिरासी महिलाओं की नसबंदी में जरूरी एहतियात का कितना ध्यान रखा गया होगा। जब कुछ महिलाओं की हालत ज्यादा बिगड़ने लगी तो उन्हें आनन-फानन में जिला अस्पताल भेजा गया। अब खुलासा हुआ है कि छत्तीसगढ़ में चल रहे परिवार नियोजन अभियान के तहत फरवरी से अब तक हुई नसबंदियों में बहुत-सी महिलाएं पहले भी गंभीर रूप से बीमार पड़ चुकी हैं। ऐसी करीब चौंसठ महिलाओं का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है। ऐसे में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत थी, पर और आपराधिक कोताही बरती गई। ऐसी ही घटना कुछ दिनों पहले राजस्थान के एक निजी अस्पताल में आयोजित मोतियाबिंद आॅपरेशन के दौरान हुई थी, जिसमें कई लोगों ने अपनी आंखें हमेशा के लिए खो दीं। चिकित्सा शिविरों में आमतौर पर निर्धन परिवारों के लोग जाते हैं। अनहोनी होने पर सरकार और चिकित्सा संस्थान मुआवजा देकर हकीकत पर परदा डालने की कोशिश करते हैं।

दरअसल, ऐसे शिविरों के आयोजन के पीछे गरीब परिवारों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने से अधिक अपना जनाधार बढ़ाने या फिर घोषित सरकारी लक्ष्य को जल्दी पूरा करने की मंशा होती है। इसलिए शिविर आयोजित करने वाले इस बात का ध्यान रखना जरूरी नहीं समझते कि इनमें योग्य और प्रशिक्षित चिकित्सकों को तैनात किया गया है या नहीं, शिविर स्थल पर साफ-सफाई और जरूरी चिकित्सीय उपकरण उपलब्ध हैं या नहीं। आॅपरेशन के समय चूंकि तेजी से संक्रमण की आशंका बनी रहती है, इसलिए अस्पतालों में इसकी रोकथाम का विशेष ध्यान रखा जाता है। आॅपरेशन के बाद रोगी को कुछ समय के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाता है। मगर चिकित्सा शिविरों में सब कुछ जल्दी से निपटाने की हड़बड़ी रहती है। उपकरणों की सफाई, जरूरी दवाएं देने आदि के मामले में लापरवाही बरती जाती है। इससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। केवल पीड़ित परिवारों को मुआवजा देकर, कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों को मुअत्तल कर या घटना की जांच करा कर ऐसे शिविरों की विश्वसनीयता नहीं बनाई जा सकती। इसके लिए कड़े दंड और स्पष्ट नियम-कायदों की जरूरत है।

 

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App