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जल में जहर

गंगा-सफाई योजना की चर्चा ने नदियों के प्रदूषण की तरफ नए सिरे से देश का ध्यान खींचा है। गंगा और दूसरी नदियों के निर्मलीकरण के वादे कहां तक पूरे होंगे, इस बारे में फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन पानी का प्रदूषण नदियों तक सीमित नहीं है। झीलों और तालाबों का भी बुरा हाल है, […]
Author December 15, 2014 13:04 pm

गंगा-सफाई योजना की चर्चा ने नदियों के प्रदूषण की तरफ नए सिरे से देश का ध्यान खींचा है। गंगा और दूसरी नदियों के निर्मलीकरण के वादे कहां तक पूरे होंगे, इस बारे में फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन पानी का प्रदूषण नदियों तक सीमित नहीं है। झीलों और तालाबों का भी बुरा हाल है, उनसे भी ज्यादा चिंताजनक स्थिति भूजल की है। देश के कम से कम सात करोड़ लोग भूजल में आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायन की मौजूदगी से प्रभावित हैं और केंद्र सरकार के पास इस समस्या से निपटने की अभी तक कोई योजना नहीं है। बीते गुरुवार को लोकसभा में ‘भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी’ पर पेश अपनी पहली रिपोर्ट में भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व वाली संसदीय समिति ने जो तथ्य दिए हैं वे एक बड़े संकट की ओर इशारा करते हैं। भूजल में कई खतरनाक रसायनों की मौजूदगी और उनके दुष्परिणामों को लेकर इससे पहले कई और अध्ययन आ चुके हैं। लगभग चार दशक पहले चंडीगढ़ में पानी में आर्सेनिक का पहला मामला सामना आया था। आज यह समस्या दस राज्यों के कुल छियासी जिलों तक फैल चुकी है।

गौरतलब है कि विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब साठ फीसद बीमारियों का मूल कारण जल प्रदूषण है। डब्ल्यूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी के प्रति एक लीटर में अधिकतम 0.01 मिलीग्राम आर्सेनिक की मौजूदगी को एक हद तक सुरक्षित मानक माना है। लेकिन भारतीय मानक ब्यूरो ने डब्ल्यूएचओ की इस ‘छूट’ और पेयजल स्रोतों की कमी को बहाना बना कर इस सीमा को बढ़ा कर प्रति लीटर 0.05 मिलीग्राम तक कर दिया। जबकि संसदीय समिति ने ब्यूरो के इस मानक का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं पाया। भारतीय मानक ब्यूरो ने मानक तय करने में ढिलाई क्यों बरती? भूजल में आर्सेनिक के खतरनाक हद तक घुले होने के चलते कैंसर, लीवर फाइब्रोसिस, हाइपर पिगमेंटेशन जैसी लाइलाज बीमारियां हो जाती हैं। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक आर्सेनिकयुक्त भूजल के कारण एक लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले गए और करीब तीन लाख के बीमार होने की पुष्टि हो चुकी है। लिहाजा, समिति ने सिफारिश की है कि भूजल में आर्सेनिक की मात्रा के सुरक्षित मानक में दी गई ढील पर तत्काल रोक लगाई जाए और इस मामले में डब्ल्यूएचओ के मानक को लागू किया जाए।

लेकिन मानक में सुधार से ही क्या आर्सेनिक से मुक्ति मिल जाएगी? जाहिर है, जब तक भूजल को प्रदूषण से बचाने का बड़ा अभियान नहीं चलेगा, समस्या न सिर्फ बनी रहेगी, बल्कि वह और विकराल रूप ले सकती है। आज देश के एक बड़े हिस्से में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता बाजार में बिकने वाले बोतलबंद पानी पर निर्भर होती जा रही है। जबकि ज्यादातर लोगों की क्रयशक्ति ऐसी नहीं है कि वे बोतलबंद पानी खरीदें। फिर, पानी के बाजारीकरण के दुनिया भर में खतरनाक नतीजे आए हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि पानी कोई आर्थिक उत्पाद नहीं, धरती की अनमोल धरोहर है और सबकी जरूरत है। संसदीय समिति की रिपोर्ट ने सरकार पर एक अहम जिम्मेदारी डाली है, वह यह कि भूजल को प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए वह शीघ्र कारगर योजना बनाए और उसे सख्ती से लागू करे।

 

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