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चिंता की दर

जब अप्रैल से जून के बीच औद्योगिक उत्पादन की दर बढ़ कर 5.7 फीसद होने की घोषणा केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने की थी, तब मोदी सरकार उसका श्रेय लेने के लिए उतावली दिख रही थी, जबकि उसे आए हुए तब महीना भर ही हुआ था। लेकिन अब जब उसके छह महीने हो गए हैं, तो […]

Author Published on: December 15, 2014 1:08 PM

जब अप्रैल से जून के बीच औद्योगिक उत्पादन की दर बढ़ कर 5.7 फीसद होने की घोषणा केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने की थी, तब मोदी सरकार उसका श्रेय लेने के लिए उतावली दिख रही थी, जबकि उसे आए हुए तब महीना भर ही हुआ था। लेकिन अब जब उसके छह महीने हो गए हैं, तो आइआइपी यानी औद्योगिक सूचकांक के ताजा आंकड़ों ने उसे चुप्पी साधने को मजबूर कर दिया है। गौरतलब है कि अक्तूबर में आइआइपी में 4.2 फीसद की गिरावट दर्ज हुई है। यह पिछले तीन साल में सबसे बड़ी गिरावट है।

फिर यह उस दौरान घटित हुई जब त्योहारी सीजन के चलते बाजार में मांग अपेक्षया अधिक रहती है। फिर, वृद्धि का दर आकलन बेस इफेक्ट यानी बीते साल की समान अवधि से तुलना के आधार पर होता है। यानी अगर पिछले वित्तवर्ष के किसी महीने में वृद्धि दर कम रही हो, तो बाद के साल के उसी महीने में वृद्धि दर का ग्राफ ऊंचा रहने की संभावना प्रबल रहती है। बीते वर्ष अ्रक्तूबर में आइआइपी काफी कम था। मगर आइआइपी के ताजा आंकड़ों को बेस इफेक्ट कमजोर रहने का भी लाभ नहीं मिल पाया। यों पिछले छह महीनों में थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव हर महीने हुआ, पर मौजूदा वित्तवर्ष में पहली बार यह नकारात्मक हुआ है। अक्तूबर में सबसे ज्यादा, 7.6 फीसद की गिरावट मैन्युफैक्चरिंग यानी विनिर्माण के क्षेत्र में दर्ज हुई है।

आइआइपी में विनिर्माण का हिस्सा करीब पचहत्तर फीसद है और कृषि के बाद यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए जाहिर है कि विनिर्माण में इतना भारी संकुचन रोजगार के लिहाज से कैसा अशुभ संकेत है। मोदी सरकार विनिर्माण को बढ़ावा देने की बातें जोर-शोर से करती रही है, पर ताजा आंकड़ों ने बता दिया है कि सरकारी घोषणाओं और हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है। विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर होना तो दूर, वह पहले के पायदान पर भी टिका नहीं रह सका।

इस साल अक्तूबर में विनिर्माण क्षेत्र पिछले साढ़े पांच साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। दूसरी ओर, डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत दस महीनों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई। जबकि मोदी ने आम चुनाव के दौरान अपनी सभाओं में रुपए के अवमूल्यन को यूपीए सरकार की नाकामी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आयात-निर्यात की खाई भी तेजी से बढ़ी है, जिसके फलस्वरूप चालू खाते का घाटा बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। इस समय सरकार को अपनी पीठ थपथपाने के लिए केवल महंगाई के आंकड़े का सहारा है। खुदरा महंगाई दर कुछ और घट कर नवंबर में 4.4 फीसद रही। पर आर्थिक मामलों के कई जानकारों और रिजर्व बैंक का भी मानना है कि इसके पीछे महंगाई में वास्तविक कमी से ज्यादा बेस इफेक्ट का कारण है, क्योंकि पिछले साल समान अवधि में महंगाई ग्यारह फीसद से भी कुछ अधिक थी।

फिर, एक सवाल यह भी उठता है कि अगर महंगाई से राहत मिली है, तो लोगों की बचत बढ़नी चाहिए; फिर टिकाऊ उपभोक्ता सामान की खरीद में कमी के आंकड़े क्यों आए हैं? पूंजीगत सामान की खपत, जो नए निवेश का सूचक मानी जाती है, उसमें भी गिरावट दिखी है। इससे आने वाले दिनों में भी आइआइपी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है। औद्योगिक उत्पादन में गिरावट और महंगाई के राहत भरे आंकड़े का हवाला देकर एक बार फिर रिजर्व बैंक से ब्याज दरें घटाने की मांग उठने लगी है। पर जो सबसे अहम मुद्दा है वह यह कि अर्थव्यवस्था को टिकाऊ गतिशीलता तभी मिल सकती है जब विकास को अधिक से अधिक समावेशी बनाया जाए, ज्यादा से ज्यादा लोगों की खरीद-क्षमता बढ़े, उन लोगों की भी आय बढ़े जो क्रय-शक्ति के लिहाज से हाशिये पर रहे हैं।

 

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