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संपादकीय: स्वायत्तता का सवाल

अगर रिजर्व बैंक ने सरकार की बात मान ली तो उसके सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसलिए उसने वे बातें मानने से इनकार कर दिया।

Author November 2, 2018 2:39 AM
रिजर्व बैंक (IMAGE SOURCE-Express photo by pradip das)

अभी सीबीआइ में मची घमासान थमी भी नहीं थी कि केंद्रीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआइ की स्वायत्तता पर हमले की चर्चा गरम हो गई। दरअसल, ताजा मामला इसलिए उठा कि केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक को अलग-अलग समय पर तीन पत्र लिख कर उसे आर्थिक मामलों में निर्देश दिए और अनुच्छेद 1934 की धारा सात की याद दिलाई। आमतौर पर सरकार रिजर्व बैंक के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करती है। अभी तक ऐसा कोई मौका नहीं आया जब सरकार ने रिजर्व बैंक को आदेश देकर कोई फैसला करने पर बाध्य किया। हालांकि धारा सात में सरकार को अधिकार है कि वह आम लोगों के हित और अर्थव्यवस्था की जरूरत के मुताबिक उसे निर्देश दे सकती है। जब रिजर्व बैंक के दूसरे नंबर के अधिकारी विरल आचार्य ने सार्वजनिक रूप से इस बात पर चिंता जताई कि सरकार आरबीआइ की स्वायत्तता में दखल दे रही है, तो मामला तूल पकड़ गया। कयास लगाए जाने लगे कि अगर सरकार ने धारा सात का उपयोग किया तो रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह और गलत होगा, क्योंकि आज तक दुनिया में कहीं ऐसा नहीं हुआ कि सर्वोच्च बैंक के मुखिया को कार्यकाल समाप्त होने से पहले ऐसी स्थिति में अपना पद छोड़ना पड़ा हो।

अच्छी बात है कि इस मामले में अब सरकार का कुछ लचीला रुख दिख रहा है। दरअसल, सरकार और रिजर्व बैंक के बीच तनाव का रिश्ता इसलिए बन गया कि इस वक्त अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में नहीं है। कई क्षेत्र पैसे की भयानक कमी से गुजर रहे हैं। ऐसे में सरकार ने पत्र लिख कर रिजर्व बैंक को निर्देश दिया कि वह बिजली कंपनियों के कर्ज में छूट दे। फिर दूसरे पत्र में उसने आरबीआइ को राजस्व की कमी को पूरा करने का निर्देश दिया। तीसरे पत्र में छोटे और मझोले उद्यमों को कर्ज देने की शर्त में छूट देने को कहा। अगर रिजर्व बैंक ने सरकार की बात मान ली तो उसके सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसलिए उसने वे बातें मानने से इनकार कर दिया। अब आलोचनाओं और आशंकाओं के मद्देनजर वित्त मंत्रालय का कहना है कि दोनों आपसी सहमति से काम करते रहेंगे, सरकार आरबीआइ को परामर्श देती रहेगी। अच्छी बात है, आरबीआइ की स्वायत्तता बनी रहे और सरकार के साथ तनातनी खत्म हो।

पहले ही कई संस्थाओं की स्वायत्तता पर हमले को लेकर सरकार को काफी किरकिरी झेलनी पड़ चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों ने पहली बार प्रेस वार्ता बुला कर असंतोष प्रकट किया था। फिर सीबीआइ के भीतर दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अप्रिय विवाद और कई अधिकारियों के रातोंरात किए गए तबादले पर अंगुलियां उठ रही हैं। इसके पहले भी कुछ संस्थाओं के कामकाज और फैसलों में हस्तक्षेप को लेकर असंतोष जाहिर हो चुका है। स्वायत्त संस्थाओं के कामकाज में सरकार की दखलंदाजी से आखिरकार देश की व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। दुनिया भर में बदनामी होती है। इसलिए सरकार आरबीआइ के मसले को अधिक तूल देने के बजाय व्यावहारिक रास्ता अपनाए, तो शायद बेहतर नतीजे निकल सकते हैं। पहले ही अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक न होने की वजह से अपेक्षित निवेश नहीं आ पाया है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से बाजार और रोजगार पर बुरा असर पड़ा है। इन सबके बीच अगर रिजर्व बैंक को अपनी नीतियों से समझौता करने को बाध्य किया गया, तो उसके नतीजे अप्रिय हो सकते हैं।

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