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फैसले का संदेश

जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: आय से अधिक संपत्ति के मामले में जयललिता को हुई सजा देश की राजनीति की भी एक अपूर्व घटना है और न्यायिक इतिहास की भी। भ्रष्टाचार या दूसरे आपराधिक मामले में दिग्गज राजनीतिकों के भी जेल जाने के कई उदाहरण हैं। पर यह पहला मौका है जब एक मुख्यमंत्री को सजा […]

Author September 29, 2014 11:11 AM

जनसत्ता 29 सितंबर, 2014: आय से अधिक संपत्ति के मामले में जयललिता को हुई सजा देश की राजनीति की भी एक अपूर्व घटना है और न्यायिक इतिहास की भी। भ्रष्टाचार या दूसरे आपराधिक मामले में दिग्गज राजनीतिकों के भी जेल जाने के कई उदाहरण हैं। पर यह पहला मौका है जब एक मुख्यमंत्री को सजा हुई है। इससे यह संदेश गया है कि कोई कितना भी ताकतवर हो, कानून से ऊपर नहीं है। यह फैसला जहां न्यायपालिका में लोगों का भरोसा और बढ़ाएगा, वहीं यह उन लोगों के लिए सख्त चेतावनी का काम करेगा, जो सोचते हैं कि पद या प्रभाव का इस्तेमाल कर वे अपने भ्रष्ट कारनामों का नतीजा भुगतने से बचे रहेंगे। जयललिता को बंगलुरुकी विशेष अदालत ने आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में चार साल की सजा सुनाई है, उन पर सौ करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया है। उनके बेहद करीबी रहे इस मामले के बाकी तीन अभियुक्तों को भी चार साल कैद की सजा हुई है, अलबत्ता उन पर लगाया गया जुर्माना कम है, दस करोड़। यह दिलचस्प है कि मुख्यमंत्री के तौर पर जयललिता प्रतीकात्मक रूप से सिर्फ एक रुपया प्रतिमाह वेतन लेती थीं। लेकिन उनका यह दिखावा तार-तार हो गया है। अठारह साल पहले, आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज हुई थी। तब वे पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं। वर्ष 1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी तीन करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की थी। उनके कार्यकाल की समाप्ति पर वह छियासठ करोड़ से ज्यादा कैसे हो गई, यह हमेशा हैरानी का विषय रहा। वे बराबर यही दोहराती रहीं कि उनके खिलाफ यह मामला राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित है। सजा सुनाए जाने के बाद भी उन्होंने यही कहा। लेकिन अदालत के फैसले के बाद संदेह की गुंजाइश नहीं बची है।

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इस फैसले के चलते जयललिता की कुर्सी भी चली गई। यों तेरह साल पहले भी भ्रष्टाचार के अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। अलबत्ता तब छह महीने बाद वे उपचुनाव जीत कर फिर मुख्यमंत्री बन गई थीं। मगर इस बार स्थिति अलग है। पिछले साल सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया, जो अदालत से दोषी करार दिए गए सांसदों और विधायकों को अपील लंबित रहने तक अपनी सदस्यता बरकरार रखने की सहूलियत देता था। जाहिर है, अब तमिलनाडु की कमान अन्नाद्रमुक के किसी और नेता के हाथ में होगी और जयललिता उसे ही चुनेंगी जिसकी वफादारी पर उन्हें पक्का भरोसा होगा। पर अन्नाद्रमुक के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है, इसलिए कि वह व्यक्ति-केंद्रित पार्टी रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने विपक्ष का सफाया कर दिया था, पर दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में उसे जयललिता के बगैर उतरना होगा। उसके बाद भी लंबे समय तक जयललिता मुख्यमंत्री पद की दावेदार नहीं हो सकेंगी, क्योंकि फैसले के मुताबिक दस साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लग गई है।

लिहाजा, इस फैसले से राज्य की राजनीति काफी हद तक प्रभावित होगी। पर ज्यादा अहम सवाल यह है कि क्या इस फैसले का असर इतनी दूर तक जाएगा कि हमारी राजनीति में पारदर्शिता का पक्ष कुछ मजबूत हो सके। हर चुनाव में सारे उम्मीदवार हलफनामे के साथ अपनी संपत्ति का ब्योरा देते हैं। जब वे अगली बार उम्मीदवारी का परचा दाखिल करते हैं तो बहुतों की घोषित संपत्ति में कई-कई गुना की बढ़ोतरी दिखती है। इसकी जांच क्यों नहीं होती कि इस अप्रत्याशित धन-वृद्धि का राज क्या है। जो लोग सत्ता के दुरुपयोग और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित हैं उन्हें ऐसे कई सवाल उठाने होंगे।

 

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