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गंगा की सुध

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हालांकि मोदी सरकार खुद गंगा के निर्मलीकरण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार करती रही है। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी यह एक खास वादा था। लेकिन बीस रोज पहले जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों के बारे में जानना चाहा […]

Author Published on: September 24, 2014 12:54 PM

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हालांकि मोदी सरकार खुद गंगा के निर्मलीकरण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार करती रही है। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी यह एक खास वादा था। लेकिन बीस रोज पहले जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों के बारे में जानना चाहा तो उसे निराश होना पड़ा। सरकार की तरफ से बताए गए उपायों पर अदालत ने कहा कि इस तरह तो गंगा की सफाई में दो सौ साल लग जाएंगे। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने चरणबद्ध योजना बनाने का निर्देश दिया था। अदालत से मिली फटकार के बाद सरकार ने नए सिरे से अपनी योजना प्रस्तुत की है। गंगा के गौरव को बहाल करने के लिए उसने अल्पावधि, मध्यम अवधि और दीर्घावधि के उपायों का खाका पेश किया है। सरकार ने अदालत को बताया है कि इन सभी उपायों को अंजाम तक पहुंचाने में अठारह साल लग जाएंगे और हजारों करोड़ रुपए का खर्च आएगा। निश्चय ही यह एक महत्त्वाकांक्षी योजना है और इसे अमली जामा पहनाने में कफी धन भी लगेगा और वक्त भी। पर पहले के अनुभवों को देखते हुए यह अंदेशा बना हुआ है कि शुरुआती तामझाम के बाद सारी योजना हीलाहवाली और पैसे की बरबादी का शिकार होकर तो नहीं रह जाएगी। तीस साल से गंगा को निर्मल बनाने के वादे किए जाते रहे हैं।

गंगा कार्ययोजना काफी धूमधाम से शुरू हुई थी और इस पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए। मनमोहन सिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया। पर गंगा की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ, उलटे वह और प्रदूषित होती गई। यों नदियों में खुद को निर्मल करते रहने की एक कुदरती खूबी होती है। पर इसकी सीमा है। अगर उन्हें सहज उपलब्ध कूड़ाघर मान लिया जाए और उनमें रोज बड़े पैमाने पर तरह-तरह की गंदगी डाली जाए, तो निर्मलीकरण की उनकी अपनी क्षमता कैसे बची रह सकती है? उलटे वे प्रदूषण का प्रवाह बन जाती हैं। नदियों के ऐन किनारे तक निर्माण-कार्यों की इजाजत देने और वहां डाले जाने वाले मलबे और कचरे के प्रति आंख मूद लेने का भयावह नतीजा हुआ है। यह स्थिति गंगा और यमुना समेत अधिकतर नदियों की है। गंगा के साथ धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। पर जल-स्रोत के रूप में भी इसकी विशिष्टता बेजोड़ है। यह ढाई हजार किलोमीटर लंबी है। इसके तटों पर उनतीस बड़े और तेईस छोटे शहर बसे हैं। इन शहरों का काफी सारा कचरा, जल-मल और औद्योगिक इकाइयों का अपशिष्ट लंबे समय से गंगा में डाला जाता रहा है। जाहिर है, इसके लिए औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ सरकारी महकमे भी जिम्मेवार हैं।

यह हैरत की बात है कि गंगा कार्ययोजना के बावजूद इस सिलसिले पर विराम नहीं लग सका। इसका सबक यही हो सकता है कि शहरी नियोजन और शहरों की जल-मल निकासी के बारे में भी नए सिरे से सोचा जाए। गंगा निर्मलीकरण का मसला इसके अविरल प्रवाह से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस नदी पर बेतहाशा बांध बनाते जाने का लोभ छोड़ना होगा। गंगा किनारे के खेतों में रसायनमुक्त खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, इसके लिए विशेष सबसिडी भी दी जा सकती है। यह भी ध्यान रहे कि नदी स्वच्छता अभियान गंगा तक सीमित न रह जाए। एक समग्र नदी-नीति बने और दूसरी नदियों को भी प्रदूषण-मुक्त बनाने की पहल हो। झीलों और तालाबों को भी इस नीति का हिस्सा बनाया जाए।

 

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