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संपादकीय: धुआं और समाधान

समस्या इसलिए भी बढ़ती चली गई, क्योंकि पराली को ठिकाने की लगाने की दिशा में सरकारों की ओर से अब तक कोई बड़ी पहल नहीं हुई। केंद्र और राज्य सरकारें थोड़ी बहुत हरकत में आर्इं भी, तो उसका कारण सुप्रीम कोर्ट की सख्ती है। किसान तो वर्षों से पराली जला रहे हैं।

Author October 13, 2018 2:40 AM
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में इस बार फिर पराली जलाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। (Express photos by Gurmeet Singh)

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में इस बार फिर पराली जलाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। बड़ी संख्या में किसान खेतों में पराली जला रहे हैं। गंभीर बात तो यह है कि किसानों ने सरकार को खुलेआम चुनौती दी है कि वे जुर्माना भरने को तैयार हैं, लेकिन पराली जलाने के अलावा उनके पास और कोई रास्ता नहीं है। जाहिर है, इससे वायु प्रदूषण फैलने का खतरा फिर पैदा हो गया है। यह हर साल की समस्या है कि अक्तूबर-नवंबर के महीने में पराली का धुआं उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बनता है। आसमान में कई दिनों तक धुएं की परत छाई रहती है और शहर गैस चैंबरों में तब्दील होने लगते हैं। लेकिन सरकारों की ओर से ऐसे ठोस कदम उठते नहीं दिख रहे हैं जो किसानों को पराली जलाने का विकल्प मुहैया कराते हों। इससे समस्या गहराती जा रही है। पराली के धुएं से राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों की आबोहवा जहरीली हुई है। यह करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। इसीलिए पिछले दो साल में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई और केंद्र व राज्य सरकारों को इस बारे में निर्देश जारी कर किसानों को किसी भी सूरत में पराली जलाने से रोकने को कहा। लेकिन दुख की बात है कि राज्यों को इस दिशा में जो त्वरित कदम उठाने चाहिए थे, वे नहीं उठाए गए।

समस्या इसलिए भी बढ़ती चली गई, क्योंकि पराली को ठिकाने की लगाने की दिशा में सरकारों की ओर से अब तक कोई बड़ी पहल नहीं हुई। केंद्र और राज्य सरकारें थोड़ी बहुत हरकत में आर्इं भी, तो उसका कारण सुप्रीम कोर्ट की सख्ती है। किसान तो वर्षों से पराली जला रहे हैं। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता तो शायद इस ओर सरकारें ध्यान भी नहीं देतीं। किसानों के सामने के सामने दिक्कत यह है कि वे पराली जलाएं नहीं तो क्या करें। इसलिए पंजाब में किसान और सरकार अब आमने-सामने हैं। हालत यह है कि किसान पराली जला रहे हैं और जुर्माना भर रहे हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। अगर जुर्माना भर कर पराली जलाने की छूट है तो किसानों के लिए यह एक आसान रास्ता बन जाएगा। ऐसे में तो निगरानी टीमें और स्थानीय प्रशासन किसानों को पराली जलाने से रोक ही नहीं पाएगा। बजाय इसके सरकारों को चाहिए कि वे किसानों को ऐसे विकल्प मुहैया कराने की ओर तत्काल कदम उठाएं जिनसे किसान खुद ही पराली जलाने को मजबूर न हों।

पराली की समस्या से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय को मिल कर काम करना है। कृषि मंत्रालय पंजाब और हरियाणा में परालीनष्ट करने के लिए किसानों को मशीनें देने की योजना पर काम कर रहा है। इन मशीनों की खरीद के लिए किसानों को सरकारी मदद भी देने की बात है। किसान इन मशीनों को चाहें तो किराए पर भी ले सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर किसानों की माली हालत ऐसी है कि पराली कटाई के लिए मशीन खरीदना उनके बूते के बाहर है। किसानों को अपनी फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम पर बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसे में यह गंभीर सवाल तो है ही किसान मशीनों को के लिए पैसा कहां से लाएंगे। सरकारें सिर्फ समस्या के फौरी इलाज में लगी हैं, ताकि इस बार धुआं न उठे और सुप्रीम कोर्ट की फटकार से बचा जा सके। इस तरह का रवैया पराली से समस्या से भी ज्यादा गंभीर है।

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