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संपादकीयः राहत और चुनौती

पूर्णबंदी का सबसे बुरा असर देश के करोड़ों छोटे उद्योगों पर पड़ा है। संकट इसलिए ज्यादा गहराया क्योंकि अचानक काम बंद हो गया और इसका नतीजा यह हुआ कि जो जहां था, वहीं ठहर गया। छोटे कारोबार नगदी के प्रवाह पर टिके होते हैं। जाहिर है, ऐसे में किसी को भी जरा संभलने का मौका नहीं मिला।

Author Published on: May 23, 2020 12:38 AM
रिजर्व बैंक ने अब कारोबारी पूंजी के लिए कर्ज की शर्तें आसान कर दी हैं।

कोरोना महामारी के कारण गहराए आर्थिक संकट से छोटे-मझौले उद्योगों और कर्जदारों को तत्काल राहत पहुंचाने के लिए रिजर्व बैंक ने एक बार फिर रेपो दर में 0.40 फीसद की कटौती की है। इसके अलावा कर्ज चुकाने की मोहलत भी तीन महीने और बढ़ा दी है। हालांकि ये दोनों बड़े कदम केंद्रीय बैंक पहले भी उठा चुका है। केंद्रीय बैंक ने एक बार फिर रेपो दर घटा कर इस बात का स्पष्ट संकेत दिया है कि अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए वह इस बात की चिंता नहीं करने वाला कि दरें काफी कम होती जा रही हैं। भले नीतिगत दरों में और कटौती क्यों न करनी पड़े, केंद्रीय बैंक अपने इस हथियार को इस्तेमाल करने से नहीं चूकेगा। इस समय सर्वोच्च प्राथमिकता छोटे उद्यमियों और अन्य कर्जदारों को बचाने की है। रेपो दर इस वक्त अपने न्यूनतम स्तर पर है और बाजार में ब्याज दरें भी पिछले बारह साल में सबसे निचले स्तर पर आ चुकी हैं।

पूर्णबंदी का सबसे बुरा असर देश के करोड़ों छोटे उद्योगों पर पड़ा है। संकट इसलिए ज्यादा गहराया क्योंकि अचानक काम बंद हो गया और इसका नतीजा यह हुआ कि जो जहां था, वहीं ठहर गया। छोटे कारोबार नगदी के प्रवाह पर टिके होते हैं। जाहिर है, ऐसे में किसी को भी जरा संभलने का मौका नहीं मिला। इससे ज्यादातर छोटे कारोबारियों के पास कर्मचारियों को वेतन देने से लेकर बिजली बिल भरने तक के लिए पैसे नहीं बचे। ऐसे में जो कारोबार बैंक कर्ज के भरोसे चल रहे हैं, उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल कर्ज की मासिक किस्तों को चुकाने की भी खड़ी हो गई। इसलिए केंद्रीय बैंक ने पिछली बार भी अपने राहत पैकेज में किस्तें चुकाने के लिए तीन महीने की मोहलत दी थी, जिसकी अवधि अब 31 मई को पूरी हो रही है। पर अब हालात को देखते हुए बैंकों ने इस अवधि को बढ़ाने की मांग की, इसलिए रिजर्व बैंक ने इसे 31 अगस्त तक के लिए बढ़ा दिया है। लेकिन कर्जदारों के सामने व्यावहारिक समस्या यह आ रही है कि उनके पास तो ब्याज चुकाने तक के पैसे नहीं हैं। केंद्रीय बैंक की रियायत सिर्फ यह है कि मासिक किस्त 31 अगस्त तक भरी जा सकती है, लेकिन ब्याज पर कोई रियायत नहीं।

रिजर्व बैंक ने अब कारोबारी पूंजी के लिए कर्ज की शर्तें आसान कर दी हैं और इन पर ब्याज भुगतान में भी मोहलत मिलेगी। पर सारी दिक्कत कर्ज के चक्र को लेकर है। सरकार और बैंक उद्योगों को कर्ज पर कर्ज देने को तो तैयार हैं, लेकिन उन्हें कर्ज से उबारने की दिशा में कोई पहल होती नहीं दिख रही। छोटे उद्योग पहले से ही कर्ज में दबे हैं, ऐसे में वे और कर्ज लेकर जोखिम क्यों लेंगे, यह बड़ा सवाल है। छोटे उद्योग लंबे समय से कर्ज पुनर्गठन और कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, व्यावसायिक बैंक एनपीए के बोझ से दबे हैं। उन्हें लग रहा है कि छोटे उद्योगों को कर्ज देने का मतलब डूबना है। इसलिए वे कर्ज देने में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। हालांकि केंद्रीय बैंक पिछले कई महीनों से नीतिगत दरों में कटौती करते हुए बैंकों पर कर्ज देने के लिए दबाव बना रहा है। लेकिन यह कवायद सफल होती दिख नहीं रही। ऐसे में रेपो दर में कटौती का कर्जदारों को कितना फायदा मिल पाएगा, यह कहा नहीं जा सकता।

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