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संत बनाम सरकार

स्वयंभू संत रामपाल को गिरफ्तार करने में जिस तरह वहां की पुलिस और अर्धसैनिक बलों को करीब हफ्ते भर तक मशक्कत करनी पड़ी, उससे हरियाणा की भाजपा सरकार पर स्वाभाविक ही अंगुलियां उठने लगी हैं। अब भाजपा यह कह कर अपना बचाव करने में जुट गई है कि कांग्रेस सरकार ने रामपाल को प्रश्रय दिया […]

स्वयंभू संत रामपाल को गिरफ्तार करने में जिस तरह वहां की पुलिस और अर्धसैनिक बलों को करीब हफ्ते भर तक मशक्कत करनी पड़ी, उससे हरियाणा की भाजपा सरकार पर स्वाभाविक ही अंगुलियां उठने लगी हैं। अब भाजपा यह कह कर अपना बचाव करने में जुट गई है कि कांग्रेस सरकार ने रामपाल को प्रश्रय दिया था, जिसके चलते उन्हें अपना साम्राज्य फैलाने और समांतर सत्ता कायम करने में मदद मिली। मगर इस तरह हरियाणा सरकार अपनी ढिलाई पर परदा नहीं डाल सकती। सही है कि जिस तरह रामपाल के आश्रम में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने हजारों लोगों को बंधक बना कर मानव सुरक्षा कवच तैयार कर लिया, गोला-बारूद, तेजाबी हथियार और र्इंट-पत्थर जमा कर रखे थे, उसमें पुलिस के लिए कोई सख्त कदम उठाना आसान नहीं था। मगर यह सवाल अपनी जगह है कि जो रणनीति उसने आखिरी दिन अपनाई वही शुरू में क्यों नहीं इस्तेमाल की। राज्य सरकार को कई दिन तक समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए, उसे केंद्र सरकार से मंत्रणा करनी पड़ी।

यह ऐसा उलझा हुआ मामला नहीं था कि सरकार को कड़े कदम उठाने के लिए इतनी ऊहापोह से गुजरना पड़ा। इतनी मोहलत किसी अपराधी के बच निकलने के लिए काफी होती है, गनीमत है, ऐसा नहीं हो पाया। इस पर भले पुलिस अपनी पीठ थपथपा ले, पर पत्रकारों को पीटने और भगदड़ का माहौल बना देने से रामपाल के सिपाहियों का जो मनोबल बढ़ा, उन्होंने आश्रम में बंधक लोगों को यातनाएं देनी शुरू कीं, फिर प्रशासन ने बिजली-पानी, राशन वगैरह की आपूर्ति बंद कर युद्ध की सी स्थिति बना दी, उससे हजारों लोगों को नाहक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इसमें एक बच्चे समेत छह लोगों को जान गंवानी पड़ी। इसकी भरपाई कैसे हो सकेगी।

छिपी बात नहीं है कि हरियाणा और पंजाब में जिस तरह स्वयंभू बाबाओं, धार्मिक नेताओं, डेरों और आश्रमों ने अपना जाल फैला रखा है, उसके पीछे राजनीतिक संरक्षण बड़ा कारण है। चुनावों में इन बाबाओं, आश्रमों और डेरों की प्रत्यक्ष भूमिका देखी गई है। हालांकि इनमें से कई बाबा गैर-कानूनी तरीके से जमीन-जायदाद जमा करने, अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसे आपराधिक मामलों में नामजद हैं। इसके बावजूद राजनीतिक पार्टियां उनसे नजदीकी बनाए रखती रही हैं तो इसलिए कि इनके भक्तों की खासी तादाद है और वे बाबाओं की इच्छा के मुताबिक मतदान करते रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रामपाल के अपनी स्वतंत्र सत्ता मजबूत करने में वहां की कांग्रेस सरकार की अनदेखी बड़ी वजह थी। पर भाजपा कब ऐसे तथाकथित संतों के खिलाफ कड़े कदम उठा पाई है।

आसाराम जैसे कुछ धार्मिक नेताओं की गिरफ्तारी के समय उसने चुप्पी साधे रखी। यहां तक कि अपने राजनीतिक समारोहों में धार्मिक नेताओं को मंच पर बिठा कर यही जताने की कोशिश करती रही है कि वह संत-समाज की हित रक्षक है। भाजपा के कई नेता सार्वजनिक मंचों से इसकी घोषणा करते रहे हैं। रामपाल की गिरफ्तारी में हुई देरी के पीछे भी यही दुविधा रही होगी कि कहीं इससे दूसरे धार्मिक नेताओं और लाखों लोगों की नाराजगी मोल न लेनी पड़े। हरियाणा के मुख्यमंत्री के सामने यह पहला मौका था, जब वे अपनी प्रशासनिक दृढ़ता का परिचय दे सकते थे, मगर विफल रहे। रामपाल प्रकरण से सबक लेते हुए हरियाणा में एक नया वातावरण बनाने की कोशिश की जा सकती है। वहां की खाप पंचायतों ने भी ढोंगी बाबाओं के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है। देखना है, मनोहरलाल खट्टर सरकार इस दिशा में क्या करती है।

 

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