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अभिव्यक्ति का अधिकार

पिछले कुछ सालों में इस पर काफी चिंता जाहिर की जा चुकी है कि फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंचों पर कुछ टिप्पणियों के आधार पर जिस तरह सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है, उसका देश के लोकतांत्रिक ढांचे और बुनियादी उसूलों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। खासकर […]

Author December 12, 2014 1:48 PM

पिछले कुछ सालों में इस पर काफी चिंता जाहिर की जा चुकी है कि फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मंचों पर कुछ टिप्पणियों के आधार पर जिस तरह सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है, उसका देश के लोकतांत्रिक ढांचे और बुनियादी उसूलों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

खासकर सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए पर कई सवाल उठाए गए और अदालतों में इसके खिलाफ याचिकाएं भी दायर की गर्इं। लेकिन न केवल केंद्र सरकार ने इसे कथित बेलगाम बोल पर काबू पाने के लिए जरूरी कानून की तरह पेश किया, बल्कि कई मौकों पर कुछ राज्यों में इस धारा का सहारा लेकर सामान्य अभिव्यक्तियों के चलते भी कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक तरह से स्थिति साफ कर दी कि सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए का सहारा लेकर किसी को भी चुप रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हालांकि इस प्रावधान की वैधता को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि बोलने की आजादी का मतलब किसी को अपमानित करना नहीं है; कानून किसी को चुप नहीं करा सकता, लेकिन वह किसी को अपमानित करने से रोक सकता है।

दरअसल, आइटी कानून की इस विवादित धारा में बोलने और अपमान करने की स्थितियों के बीच की अस्पष्टता ने ही शासन के हाथ खोल दिए हैं और वह एक सार्वजनिक बयान या टिप्पणी की अपनी सुविधा से व्याख्या करके किसी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। सवाल है कि एक टिप्पणी के पीछे व्यक्ति की किसी खास मंशा का पता लगाने का क्या मानक होगा?

सही है कि सोशल मीडिया के मंचों पर लोगों की पहुंच लगातार बढ़ी है, मगर वहां कुछ लिखने या टिप्पणी करने के मामले में वैसी परिपक्वता नहीं दिखाई देती। बीते कुछ समय में ट्विटर और फेसबुक जैसे मंचों को कुछ समूहों ने नफरत फैलाने तक में इस्तेमाल किया। लेकिन अभी तक सोशल मीडिया पर कोई टिप्पणी करने या फिर तस्वीर साझा करने के चलते जिन लोगों की गिरफ्तारियां सुर्खी बनी, वे बेहद सामान्य मामले थे और उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन कहा जा सकता है। मसलन, मुंबई में बाल ठाकरे के निधन के बाद दो बच्चियों को जिस टिप्पणी पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया था, या फिर ममता बनर्जी के एक कोलाज को प्रसारित करने के आरोप में जादवपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को गिरफ्तार कर लिया गया था, वह अपने आप में इस कानूनी प्रावधान के दुरुपयोग को दर्शाता है।

इस मसले पर केंद्र सरकार का पक्ष भले यह हो कि आइटी एक्ट की इस धारा के तहत की गई गिरफ्तारियां अफसरों के अधिकारों के दुरुपयोग की इक्का-दुक्का घटनाएं थीं, लेकिन अदालत ने सही कहा कि कानून के दुरुपयोग की अपवाद घटनाएं भी अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। गौरतलब है कि आइटी अधिनियम की धारा 66-ए के तहत किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया के मंचों पर आपत्तिजनक संदेश प्रेषित करने पर तीन साल की कैद का प्रावधान है। लेकिन इसमें मौजूद अस्पष्टता के चलते संविधान के तहत बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन होता है। जाहिर है, लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी शासन इस अधिकार को कम नहीं कर सकता। किसी भी देश में अभिव्यक्ति या बोलने की आजादी की स्थिति से ही यह तय होगा कि वहां का लोकतंत्र कितना मजबूत या कमजोर है। अगर किन्हीं हालात में किसी भी पक्ष की ओर से व्यक्ति के बोलने के अधिकार पर पाबंदी लगाई जाती है या उसे बाधित किया जाता है तो इससे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचेगा।

 

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