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सावधानी की मुद्रा

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: रिजर्व बैंक को अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करते समय अमूमन हर बार इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि महंगाई पर काबू पाने और बाजार में पूंजी प्रवाह बढ़ाने में से किसे ज्यादा तवज्जो दी जाए। ताजा मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि उसने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी […]

Author October 1, 2014 11:56 am

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: रिजर्व बैंक को अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करते समय अमूमन हर बार इस दुविधा से जूझना पड़ता है कि महंगाई पर काबू पाने और बाजार में पूंजी प्रवाह बढ़ाने में से किसे ज्यादा तवज्जो दी जाए। ताजा मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि उसने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। रिजर्व बैंक ने कुछ भी बदलाव करने से परहेज किया है। रेपो दर को आठ फीसद पर और रिवर्स रेपो दर को सात फीसद पर स्थिर रखा है। नकद आरक्षित अनुपात भी पहले की तरह चार फीसद पर बरकरार है। बैंकों को अपनी जमा राशियों का सीआरआर के बराबर हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है, जिस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिलता। रेपो दरों में कटौती के बिना जब कर्ज के लिए ज्यादा पूंजी की गुंजाइश बनानी होती है तो रिजर्व बैंक सीआरआर या एसएलआर या दोनों में कटौती का विकल्प चुनता है। पर उसने न तो सीआरआर में कोई राहत दी न एसएलआर में। पिछली बार नीतिगत दरों को यथावत रखते हुए रिजर्व बैंक ने एसएलआर यानी सांविधिक तरलता अनुपात में बैंकों को राहत दी थी, ताकि उनके पास ऋण देने के लिए ज्यादा पूंजी उपलब्ध हो। पर इस दफा एसएलआर को भी बाईस फीसद पर जस का तस बनाए रखा है। एसएलआर जमा राशियों का वह हिस्सा है जिसे बैंकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में रखना अनिवार्य है।

ताजा मौद्रिक समीक्षा पर उद्योग जगत ने निराशा जताई है। दरअसल, दो खास वजहों से बहुतों को यह उम्मीद थी कि ब्याज दरें घटाई जाएंगी। एक तो यह कि हाल में थोक महंगाई दर चार फीसद से नीचे आ गई, जो कि पिछले पांच साल का न्यूनतम स्तर है। दूसरी तरफ, जुलाई में औद्योगिक विकास दर महज आधा फीसद रही। लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने नीतिगत दरों में कोई फेरबदल नहीं किया तो यह मौजूदा वित्तीय हालात के प्रति उनका सावधानी भरा रुख है। थोक महंगाई दर भले चार फीसद से कुछ नीचे दर्ज हुई हो, पर खुदरा महंगाई आठ फीसद के आसपास है। लोगों का वास्ता थोक बाजार से नहीं, खुदरा बाजार से पड़ता है। यह सवाल क्यों नहीं उठाया जाता कि थोक और खुदरा कीमतों के बीच ऐसी खाई क्यों है और इसे तर्कसंगत बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। आलू इस वक्त थोक और खुदरा कीमत के बीच बेहिसाब अंतराल का सबसे चुभता हुआ उदाहरण है। जब यह सीधे उत्पादक से खरीदा जाता है तो आठ या नौ रुपए किलो से ज्यादा नहीं पड़ता। पर कोल्ड स्टोरेज से निकला आलू उपभोक्ता आरंभिक खरीद-मूल्य से कई गुना दाम पर खरीदने को विवश हैं।

इस साल देश के कई बड़े राज्यों में मानसून के कमजोर रहने से कृषि पैदावार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यानी खासकर खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी का अंदेशा बरकरार है। रिजर्व बैंक ने अगले साल खुदरा महंगाई को आठ फीसद और 2016 में छह फीसद पर लाने का लक्ष्य रखा है। पर इस समय खुदरा महंगाई जहां है उसी को अगले साल के लिए लक्ष्य मानना गले नहीं उतरता। अगर यही अगले साल का लक्ष्य है तो नीतिगत दरों में कटौती उस समय भी कैसे की जा सकेगी! महंगाई के कारण बचत को झटका लगता है। फिर इसका नतीजा बाजार में मांग के सुस्त पड़ने के रूप में आता है। दूसरी ओर, महंगाई की चिंता में अगर ब्याज दरें ऊंची बनाए रखी जाती हैं, तो आवास, वाहन आदि के लिए कर्ज लेने को लोग उत्साहित नहीं होते। इस तरह एक दुश्चक्र-सा बन जाता है। पर सारी उम्मीद मौद्रिक कवायद से ही क्यों की जाए? महंगाई दूर करने के वादे पर आई भाजपा सरकार ने खुद इस दिशा में अब तक क्या किया है!

 

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