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संपादकीयः खुशी की खोज

ऐसा लगता है कि हमारी समूची जिंदगी गुजरती तो है हर पल खुशी की खोज में, लेकिन हमने अपने आसपास ऐसा संजाल खड़ा कर लिया है कि उसमें अपनी ही यह मर्जी हमें खास लगती है या कई बार असहज लगने लगती है। सहज क्या है? सहज उसे मान लिया जाता है, जो सब कुछ सामाजिक मानदंडों के तहत चलता रहता है।

Author Published on: February 27, 2020 1:04 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

इसे शायद एक दर्ज करने वाली खास घटना के तौर पर देखा जाएगा कि दुनिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली ताकत अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप ने अपने दौरे में राजधानी के स्कूल को और उसमें भी उस गतिविधि देखना चुना, जो आजकल सुर्खियों में है। दरअसल, दिल्ली के एक सर्वोदय स्कूल में उनके दौरे का सबसे अहम केंद्र ही यह देखना और जानना था कि वहां की खुशहाली की कक्षा में किसी तरह खुशियां खिलखिलाती हैं! तो हुआ यह कि मेलानिया जिस उम्मीद से उस स्कूल में बच्चों के बीच गईं, उसमें उन्हें कुछ ज्यादा ही मिला। वहां बच्चों के लिए वे किसी परीकथा की नायिका सरीखी थीं, तो खुद मेलानिया को मासूमों की खुशहाली के बीच एक खास खुशी का एहसास मिला।

दरअसल, स्कूली पाठ्यक्रमों में अब तक आमतौर पर कक्षा की किताबें ही शामिल रही हैं और वही बच्चों या विद्यार्थियों की स्कूली गतिविधियों का मुख्य हिस्सा माना जाता रहा है। इसके अलावा, खेल-कूद को भी जगह मिल जाती है। लेकिन शायद ही कहीं इस बात की जरूरत महसूस की गई कि स्कूल में बच्चों के सिर पर पढ़ाई के बोझ से राहत और फिर खुशी को सीधे महसूस कराए जाने को कक्षा की गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाए। इस लिहाज से देखें तो दिल्ली के स्कूलों में चल रहा ‘हैप्पीनेस क्लास’ एक नायाब प्रयोग है।

अब तक स्कूली पाठ्यक्रम में किताबों, कक्षा और परीक्षा के चक्र ने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के सामने कैसी चुनौतियां खड़ी की हैं, यह हम सबके सामने है। खासतौर पर परीक्षा और नतीजों के तनाव में घुलते कितने ही बच्चों के व्यक्तित्व का विकास अधूरा रह जाता है तो कई बार खुदकुशी तक की खबरें आ जाती हैं। इसलिए स्कूल की कक्षा में ही अगर व्यावहारिक रूप से खुशहाली के एहसास को एक जरूरी हिस्सा बनाया जाता है तो यह बेशक खास है। वैसे भी, रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए आखिर वह कौन-सा भाव है, जिसकी खोज में हम आमतौर पर हर वक्त होते हैं? जज्बातों के लिहाज से हमारे हर काम, जिंदगी की हर गतिविधि की मंजिल क्या होती है? जाहिर है, अमूमन सभी कुछ करते हुए हमारी मंशा का आखिरी बिंदु यही होता है कि हम जो कर रहे हैं, उससे हमें थोड़ी खुशी मिले। लेकिन क्या हमारी सामाजिक से लेकर राजनीतिक व्यवस्था में अपने मन की खुशी की खोज की आजादी हासिल करना इतना ही आसान है?

ऐसा लगता है कि हमारी समूची जिंदगी गुजरती तो है हर पल खुशी की खोज में, लेकिन हमने अपने आसपास ऐसा संजाल खड़ा कर लिया है कि उसमें अपनी ही यह मर्जी हमें खास लगती है या कई बार असहज लगने लगती है। सहज क्या है? सहज उसे मान लिया जाता है, जो सब कुछ सामाजिक मानदंडों के तहत चलता रहता है। पहले से कायम परंपराओं के मुताबिक जीना-मरना, हंसना-रोना, पढ़ना-लिखना और अपना हर सामाजिक बर्ताव तय करना सहज माना जाता है और अगर कोई इंसान अपनी इच्छा से खुशी चुनने की कोशिश करता है तो उसके लिए उसे जद्दोजहद करनी पड़ती है, बल्कि कई बार असामान्य हालात से गुजरना पड़ता है। हालांकि हम जिस खुशी की खोज में लगातार खुद को मसरूफ रखते हैं, उसकी कई-कई परतें हो सकती हैं। लेकिन हमारी सामाजिक व्यवस्था फिलहाल कोई ऐसा ढांचा नहीं तैयार कर सकी है कि हमारी खुशी निर्बाध हो। इसलिए दिल्ली के स्कूली बच्चों के बीच अगर खुशहाली की खोज की कोशिश देखी जा रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इसका असर हमारी भावी पीढ़ियों के मानस और फिर आपसी सद्भाव और प्रेम के भाव से लैस एक बेहतर इंसानी समाज की आबोहवा तैयार करेगा।

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