सत्ता और सड़क

दिल्ली में एनडीएमसी यानी नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने यातायात नियमों को ताक पर रख कर सड़कों के दोनों किनारों और विभाजक पत्थरों को लगभग भगवा और हरे रंग में रंग दिया है। फुटपाथों के किनारों, विभाजक या डिवाइडर, जेब्रा-क्रॉसिंग और गति-अवरोधक आदि पर काली, पीली और सफेद पट्टियां इसलिए बनाई जाती हैं कि इन […]

दिल्ली में एनडीएमसी यानी नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने यातायात नियमों को ताक पर रख कर सड़कों के दोनों किनारों और विभाजक पत्थरों को लगभग भगवा और हरे रंग में रंग दिया है। फुटपाथों के किनारों, विभाजक या डिवाइडर, जेब्रा-क्रॉसिंग और गति-अवरोधक आदि पर काली, पीली और सफेद पट्टियां इसलिए बनाई जाती हैं कि इन रंगों की दृश्यता दूसरे रंगों के मुकाबले स्पष्ट और दूर तक होती है। खासकर रात के समय अंधेरे या कुहरे वाले दिनों में भी इन रंगों से रंगे पत्थर रोशनी पड़ने पर चमकने लगते हैं और सड़क पर वाहन चालकों को सुरक्षित चलने में मदद मिलती है। जाहिर है, इससे हादसे की आशंका कम होती है। जबकि दिल्ली में फुटपाथों के किनारों को जो नया रंग दिया गया है, वह इस लिहाज से खतरनाक है कि इन दोनों रंगों की दृश्यता कम है और यह रात के समय और धुंधलके में खतरनाक साबित हो सकता है। इसके अलावा, जो लोग आंखों की परेशानी के कारण रंगों को एकबारगी नहीं पहचान पाते, यह उनके लिए भी सड़क पर चलते हुए निर्णय करने के लिहाज से जोखिम भरा है। इस मामले में एनडीएमसी ने एक विचित्र तर्क दिया है कि सड़क पर जहां जरूरी है, वहां रोशनी पड़ने पर चमकने वाले स्टीकर लगाए गए हैं। तथ्य यह है कि फुटपाथों, डिवाइडरों आदि के रंग अगर हर जगह सफेद या पीले और काले रखे जाते हैं, तो इसलिए कि सड़क पर चलते हुए हर कदम पर सावधानी बरती जा सके।

गौरतलब है कि यातायात संकेतकों को लेकर वियना में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के अलावा खुद भारतीय सड़क कांग्रेस और यातायात से जुड़े महकमों ने भी सुरक्षा की दृष्टि से फुटपाथों के किनारों या डिवाइडरों के लिए सफेद, पीले और काले रंगों को मानक माना है। लेकिन यह समझ से परे है कि अचानक एनडीएमसी ने क्यों इन्हें तकरीबन भगवा और हरे रंग में पोत दिया। ये दोनों रंग भाजपा के झंडे में शामिल हैं। शायद इसीलिए ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं कि एनडीएमसी ने फुटपाथों के पत्थरों को ये रंग भाजपा को खुश करने के लिए दिया है।

इसकी आलोचना न सिर्फ दूसरे राजनीतिक दलों ने की है, बल्कि खुद एनडीएमसी के सदस्यों और यातायात पुलिस ने भी मोटर वाहन अधिनियम का हवाला देते हुए इस कवायद पर आपत्ति जताई है। सार्वजनिक स्थानों पर रंगों को लेकर यह मोह आमतौर पर राजनीतिक दलों के सत्ता में आने के बाद देखा गया है। पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी सत्ता में आर्इं, तो उन्होंने कोलकाता में तमाम सरकारी इमारतों, पुलों, बत्तियों को नीले रंग में पोतने के आदेश दे दिए। बस और सड़क के डिवाइडर भी नीले और सफेद रंग में रंग दिए गए। यही नहीं, वाहनों में लाल की जगह नीली या हरी बत्ती का इस्तेमाल करने को कहा गया। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते मायावती ने भी लखनऊ शहर को नीले रंग से भर दिया था। यह समझना मुश्किल है कि राजनीतिक दलों को अपनी विचारधारा बचाए रखने के लिए उन जगहों को भी अपने प्रतीक वाले रंग में रंगना जरूरी क्यों लगता है, जो राजनीतिक विवादों के क्षेत्र नहीं होते हैं। एनडीएमसी अपनी ताजा कवायद के पीछे भले सौंदर्यीकरण की दलील दे रही है, लेकिन इसे किसी खास राजनीतिक दल को खुश करने की कीमत पर सड़क-सुरक्षा को कमजोर करके हादसे की स्थितियों को बढ़ाने की तरह ही देखा जाएगा।

 

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