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विरासत की राजनीति

जवाहरलाल नेहरू की एक सौ पच्चीसवीं जयंती के अवसर पर यह स्वाभाविक ही है कि देश के लोग उन्हें शिद््दत से याद करें। कांग्रेस के लिए तो यह मौका और भी मायने रखता है। आज की कांग्रेस भले उस जमाने की कांग्रेस जैसी न हो, पर इसके इतिहास के साथ नेहरू का नाम जुड़ा हुआ […]

Author November 19, 2014 1:31 AM
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जवाहरलाल नेहरू की एक सौ पच्चीसवीं जयंती के अवसर पर यह स्वाभाविक ही है कि देश के लोग उन्हें शिद््दत से याद करें। कांग्रेस के लिए तो यह मौका और भी मायने रखता है। आज की कांग्रेस भले उस जमाने की कांग्रेस जैसी न हो, पर इसके इतिहास के साथ नेहरू का नाम जुड़ा हुआ है, वे इसके सबसे बड़े नेता थे। लेकिन क्या यह उचित है कि इस विरासत को राजनीतिक रंग दिया जाए? लेकिन ऐसा लगता है कि इतिहास के बड़े नामों को भुनाने की होड़ चल रही है, चाहे वे जवाहरलाल नेहरू हों या सरदार पटेल। नेहरूजी को याद करने के लिए कांग्रेस ने जो आयोजन किया उससे लगा कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की बढ़ी हुई ताकत से वह आक्रांत है। विज्ञान भवन में हुए दो दिन के सम्मेलन में कांग्रेस के अलावा गैर-राजग दलों के नेताओं ने शिरकत की। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई समेत कई विदेशी मेहमान भी थे। भाजपा को न्योता नहीं दिया गया, न प्रधानमंत्री को। शायद ऐसा यह जताने के लिए किया गया कि मोदी जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं उसका नेहरू के मूल्यों से कोई साम्य नहीं है।

यह तर्क अपनी जगह सही है। पर देश के पहले प्रधानमंत्री को याद करने का सवा सौवीं जयंती जैसा विशेष अवसर हो, तो वर्तमान प्रधानमंत्री को भी निमंत्रण दिया जाना चाहिए था। यों मोदी का कार्यक्रम पहले से तय था, वे उस समय विदेश में थे। कांग्रेस के बुलाए सम्मेलन में वे कैसे आते? अलबत्ता उन्हें आमंत्रित करके कांग्रेस यह संदेश जरूर दे सकती थी कि इस सम्मेलन को वह सबका आयोजन मान कर चल रही है। यह इसलिए भी जरूरी था कि जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के सर्वोच्च नेता होने के अलावा आजादी की लड़ाई के एक बड़े नायक थे। आजादी के बाद भी उनका दौर आज से बुनियादी रूप से भिन्न था। अगर सम्मेलन में आकर उस दौर को याद करते हुए भाजपा के प्रतिनिधि भी नेहरू की प्रासंगिकता रेखांकित करते, तो इसमें क्या परेशानी थी? अगर वे इससे उलट कुछ कहते, तो संभवत: आलोचना के पात्र बनते। पर कांग्रेस ने उदारता न दिखा कर यह मौका गंवा दिया। लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त ने उसका आत्मविश्वास डिगा दिया है। फिर महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में मिली पराजय ने उसकी हताशा और बढ़ा दी है। ऐसे में नेहरू के स्मरण पर्व में उसने अपने लिए एक राजनीतिक सहारा ढूंढ़ने की कोशिश की। भाजपा निमंत्रण न मिलने से झुंझलाई हुई नजर आई। उसने ताना भी मारा कि नेहरू पूरे देश के हैं, केवल कांग्रेस के नहीं। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की सवा सौवीं जयंती पर मोदी सरकार की ओर से अखबारों में कोई विज्ञापन नजर नहीं आया, जबकि इससे पहले सरदार पटेल की जयंती पर सरकारी विज्ञापनों की झड़ी लगी थी।

गुजरात सरकार ने सरकारी स्कूलों के लिए जो परिपत्र भेजा उसमें जवाहरलाल नेहरू का नहीं, केवल बाल दिवस का जिक्र था। दोनों पार्टियों ने जैसे को तैसा का रवैया प्रदर्शित किया। बहरहाल, चाहे महात्मा गांधी हों, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण या उनके कद का कोई और, राजनीतिक दल अगर उनकी विरासत पर दावेदारी जताना चाहते हैं तो जरूर जताएं, पर साथ ही उन्हें उस दौर को जरा ईमानदारी से याद करना चाहिए। तब राजनीति देशसेवा और समाजसेवा का पर्याय थी, राजनीति में आने वाले लोग निजी सुख-सुविधा का त्याग करते थे, सादगी भरा जीवन जीते थे, सुरक्षा के तामझाम से परहेज करते थे। नेताओं के बीच मतभेद थे, अलग-अलग पार्टियां थीं, पर सार्वजनिक जीवन की गरिमा बनाए रखना राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा था। आज की राजनीति में उसकी झलक भी कहीं मुश्किल से दिखेगी।

 

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