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पेशावर सैनिक स्कूल: दहशत के ठिकाने

पाकिस्तान के पेशावर में सैनिक स्कूल के भीतर घुस कर जिस तरह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादियों ने एक सौ बत्तीस बच्चों समेत कुल एक सौ इकतालीस लोगों को गोलियों से भून डाला उसने पूरी दुनिया को दहला दिया है। यह घटना आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की तैयारियों पर गहरा निशान छोड़ गई है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान […]

पाकिस्तान के पेशावर में सैनिक स्कूल के भीतर घुस कर जिस तरह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादियों ने एक सौ बत्तीस बच्चों समेत कुल एक सौ इकतालीस लोगों को गोलियों से भून डाला उसने पूरी दुनिया को दहला दिया है। यह घटना आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की तैयारियों पर गहरा निशान छोड़ गई है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का कहना है कि उसने यह हमला पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाने के लिए किया। पिछले कुछ समय से पाकिस्तानी सेना ने जर्ब-ए-अजब अभियान के तहत तालिबान पर शिकंजा कसना शुरू किया है, जिसमें करीब तेरह सौ आतंकवादी मारे जा चुके हैं।

तालिबान ने कहा है कि पाकिस्तानी सेना ने उनके परिजनों को परेशान करना और मारना शुरू किया है, इसलिए बदले की भावना से उनके बच्चों को मारा गया ताकि वे भी अपनों का दर्द महसूस कर सकें। जाहिर है, वहां तालिबान का मंसूबा इस कदर बढ़ चुका है कि वह सेना के साथ आरपार की लड़ाई पर उतर आया है। ऐसे में पाकिस्तानी हुक्मरान और फौज को अपनी रणनीति पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। उसे खतरा अकेले तालिबान से नहीं, दूसरे कट््टरपंथी संगठनों से भी है, जिन्हें वह अपने लिए खतरा नहीं मानता। यह समझने की जरूरत है कि आतंकवाद का कोई मजहब या देश नहीं होता। उसे कहां-कहां से इमदाद मिल रही है, अब छिपी बात नहीं है। जरूरत पड़ने पर एक संगठन दूसरे का हाथ थाम कर चुनौती पेश करने से बाज नहीं आता। पूरी दुनिया में जिस तरह कट्टरपंथी विचारों के जरिए युवाओं में जहर भरा जा रहा है, उससे तमाम देशों के लिए खतरा पैदा हो गया है।

आइएसआइएस इस वक्त दुनिया का सबसे ताकतवर आतंकी संगठन बन चुका है। उसके लोग किन-किन देशों में तैयार हो रहे हैं, कहना मुश्किल है। अल कायदा भले कुछ कमजोर हो गया हो, पर उसकी जड़ें अभी सूखी नहीं हैं। ऐसे में पाकिस्तान के लिए आतंकवाद से खतरे दिनों-दिन बढ़ते गए हैं।

दरअसल, पाकिस्तान में दहशतगर्दों के लगातार ताकतवर होते जाने के पीछे उसका दोहरा रवैया काफी जिम्मेदार रहा है। सब जानते हैं कि वह तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ तो कड़ा रुख अपनाए हुए है, मगर दूसरे कई संगठनों को पनाह दिए हुए है। वहां की सेना खुद आतंकी संगठनों को पोसती रही है। मगर पेशावर की घटना के बाद उसे सबक लेने की जरूरत है कि आतंकवाद को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना किसी भी रूप में उचित नहीं। इसके चलते वह पहले भी कई बार जख्मी हो चुका है। इस बार मासूम बच्चों को निशाना बना कर तालिबान ने न सिर्फ दुनिया के जघन्यतम अपराध को अंजाम दिया, बल्कि उसने एक तरह से संकेत भी दिया है कि अपना दबदबा कायम करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है।

पाकिस्तान की मुश्किल यह है कि दहशतगर्दी रोकने के मामले में वहां के हुक्मरान और फौजी अफसरों के बीच तालमेल ठीक नहीं बन पाता। जब-जब राजनीतिक स्तर पर कोई सकारात्मक पहल हुई है, वहां की सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने उसमें बाधा डालने की कोशिश की है। दोनों के बीच यह रणनीतिक दूरी खतरनाक रूप लेती गई है। इस शोक की घड़ी में भारत स्वाभाविक रूप से उसके साथ खड़ा हुआ है। दहशतगर्दी अकेले पाकिस्तान की समस्या नहीं, दुनिया के तमाम देशों के लिए चिंता का विषय है। अगर वह सबके साथ हाथ मिला कर आतंकवाद से निपटने का संकल्प ले तो न सिर्फ अपनी अस्थिरता, अशांति और बदहाली से बाहर निकलने में कामयाब हो सकता है, बल्कि इससे दूसरे देशों को भी राहत मिलेगी।

 

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