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अफगानिस्तान की राह

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हामिद करजई का उत्तराधिकारी कौन होगा, इस सवाल पर अफगानिस्तान में कई महीनों से चला आ रहा राजनीतिक गतिरोध दूर हो गया है। इससे जहां नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ है और गृहयुद्ध की नौबत आने की आशंका दूर हुई है, वहीं अमेरिका ने भी राहत की सांस […]

Author September 24, 2014 1:01 PM

जनसत्ता 24 सितंबर, 2014: हामिद करजई का उत्तराधिकारी कौन होगा, इस सवाल पर अफगानिस्तान में कई महीनों से चला आ रहा राजनीतिक गतिरोध दूर हो गया है। इससे जहां नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ है और गृहयुद्ध की नौबत आने की आशंका दूर हुई है, वहीं अमेरिका ने भी राहत की सांस ली है। गतिरोध तोड़ने की पहल अमेरिका ने ही की थी और उसी के सुझाए राष्ट्रीय एकता सरकार के फार्मूले पर राष्ट्रपति चुनाव के दोनों प्रमुख उम्मीदवारों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते के मुताबिक अशरफ गनी नए राष्ट्रपति होंगे। प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के तौर पर एक नया पद सृजित होगा, जिसके अधिकार लगभग प्रधानमंत्री जैसे होंगे।

इस पद पर कौन आसीन होगा यह फिलहाल साफ नहीं है, पर यह तय हो चुका है कि राष्ट्रपति पद के दूसरे प्रमुख उम्मीदवार रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला की तरफ से मनोनीत कोई व्यक्ति ही यह जिम्मेदारी संभालेगा। असामान्य परिस्थितियों में एकता-सरकार का प्रयोग दुनिया के कई देशों में हो चुका है। अफगानिस्तान में कुछ महीनों से जैसी हालत थी, उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। नए राष्ट्रपति के लिए हुए चुनाव ने करजई के बाद सत्ता-संचालन का मसला हल करने के बजाय एक राजनीतिक संकट को जन्म दिया।

इन चुनावों में, तालिबान की धमकियों के बावजूद, अफगान मतदाताओं ने बड़ी तादाद में हिस्सा लिया, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उनका उत्साह जाहिर हुआ। मगर जून में हुए दूसरे दौर के मतदान के बाद अब्दुल्ला ने बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप लगाया और कहा कि इस चुनाव का नतीजा उन्हें हरगिज स्वीकार्य नहीं होगा। गनी और अब्दुल्ला के समर्थकों के बीच बहुत-सी झड़पें भी हुर्इं। अब्दुल्ला ने समांतर सरकार बनाने की धमकी भी दी थी। जाहिर है, इस स्थिति ने अमेरिका को काफी चिंतित किया, जिसे अफगानिस्तान से एक नया सुरक्षा-समझौता करना है। लिहाजा, ओबामा दोनों पक्षों के बीच सुलह का रास्ता निकालने में जुट गए। संयुक्त राष्ट्र ने चुनाव का आॅडिट कराया। पर चुनाव का नतीजा घोषित नहीं किया गया। इसकी वजह शायद यह रही हो कि किसी को विजेता घोषित करना खतरे से खाली नहीं था।

गनी को बढ़त हासिल थी, पर दूसरी तरफ करीब साढ़े आठ लाख वोट अवैध पाए गए। बहरहाल, गनी और अब्दुल्ला के बीच समझौता कराने में ओबामा भले सफल हो गए हों, पर सवाल है कि क्या यह व्यवस्था सुचारु रूप से काम कर पाएगी, जिसमें सत्ता का विभाजन दो ऐसे नेताओं के बीच हुआ है जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं और कल तक एक दूसरे पर धांधली के आरोप मढ़ रहे थे। साफ है कि उन्हें समझौते के फलस्वरूप मिली जिम्मेदारियों का निर्वाह करना है तो पहले की कटुता भुलानी होगी। अपने-अपने समर्थकों को भी नियंत्रित रखना होगा।

नई सरकार के सामने पहला अहम काम उस सुरक्षा-करार को अंजाम देना है जिसके तहत अमेरिकी और अन्य नाटो सैनिकों को एक सीमित संख्या में 2014 के बाद भी अफगानिस्तान में तैनात रहने की मंजूरी होगी। इस प्रस्तावित समझौते को मानने को करजई तैयार नहीं थे और इस बात पर अमेरिका उनसे खफा था। मगर न गनी को इस पर कोई एतराज है न अब्दुल्ला को। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती तालिबान से निपटने की है। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना भी नई सरकार के लिए एक कठिन काम होगा। सत्ता के विभाजन के तहत सेना की कमान राष्ट्रपति के हाथ में होगी, मंत्रिमंडल भी उनके प्रति जवाबदेह होगा। जबकि सरकारी नीतियों को कार्यान्वित करने की जिम्मेदारी प्रमुख कार्यकारी अधिकारी की होगी। पर ऐसे कई मामले हैं जिनमें अधिकारों का बंटवारा साफ नहीं है। ऐसे में अफगानिस्तान की नई सत्ता-व्यवस्था की सफलता अंतत: गनी और अब्दुल्ला की सूझबूझ और उनके आपसी तालमेल पर निर्भर करेगी।

 

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