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ईमानदारी की मिसाल

आज भ्रष्टाचार और घोटालों को व्यवस्था और समाज के सबसे बड़े रोग के रूप में मान लिया गया है और सौ-दो सौ रुपए जैसी बहुत छोटी रकम के लिए भी हत्या तक कर देने की खबरें आती हैं। ऐसे में रुपए से भरा बैग रास्ते में लावारिस मिलने के बावजूद एक गरीब परिवार के दो […]

Author December 9, 2014 12:13 PM
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आज भ्रष्टाचार और घोटालों को व्यवस्था और समाज के सबसे बड़े रोग के रूप में मान लिया गया है और सौ-दो सौ रुपए जैसी बहुत छोटी रकम के लिए भी हत्या तक कर देने की खबरें आती हैं। ऐसे में रुपए से भरा बैग रास्ते में लावारिस मिलने के बावजूद एक गरीब परिवार के दो बच्चों के भीतर कोई लोभ नहीं पैदा हुआ तो यह हैरानी की बात लगती है। वाकया मुंबई में भिवंडी का है, जहां पिछले हफ्ते लगभग बारह साल के अनिकेत और मोनाली नाम के दो स्कूली बच्चों को घर लौटते हुए अस्सी हजार रुपयों से भरा बैग मिला। संयोग से उसमें एक पासबुक और फोन नंबर था। बच्चों ने तुरंत अपने पिता सादू को बताया और उन्होंने पड़ोसी से मोबाइल लेकर सेवानिवृत्त शिक्षक अफजल खान को खोज कर उन्हें वह बैग सौंप दिया। गौरतलब है कि सादू सुरक्षा गार्ड की नौकरी और उनकी पत्नी घरेलू सहायिका का काम करके गुजारा करते हैं, एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं। सभी जानते हैं कि एक सुरक्षा गार्ड और घरेलू काम की आय पर निर्भर किसी दंपति को कितनी आमदनी होती होगी। लेकिन उतने में ही गुजारा करते उस परिवार ने ईमानदारी और नैतिकता का मूल्य सीखा है वह एक मिसाल है।

हालांकि हमारे समाज में कमजोर तबकों के लोगों पर विश्वास करने के मामले कम पाए जाते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि ईमानदारी साबित करने की ज्यादातर घटनाएं इन्हीं के बीच से सामने आती हैं। चकाचौंध से भरे शहरों-महानगरों के किन्हीं गुमनाम कोनों में खड़े ऐसे ही लोग दुनिया में नैतिकता और इंसानियत में भरोसा बचाए रखते हैं, लेकिन विकास की मौजूदा परिभाषा और दायरे से वंचित भी यही वर्ग है। यह ज्यादा से ज्यादा धन की भूख और विकास का फायदा उठाने वाले वर्गों के मुकाबले अभावों के बीच गुजर-बसर करने वालों की हकीकत है। सवाल है कि वह कौन-सा पारिवारिक और सामाजिक प्रशिक्षण है, जिसमें पलते-बढ़ते बच्चे हजारों रुपयों से भरा बैग देख कर भी लालच में नहीं आते? अगर कोई व्यक्ति या परिवार ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों को लेकर दृढ़ है तो इस तरह की बातें बच्चों के स्वभाव और आचरण में घुलना मुश्किल नहीं है।

चोरी के धन को पाप और लालच को बुरी बला बताने वाली सीख हमारी परंपरा में हमेशा रही है। लेकिन कोई समाज कैसा है यह नसीहतों और सूक्तियों से नहीं, आचरण से जाना जाता है। जापान को एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है, जहां सुनामी के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़ कर सुरक्षित जगहों पर चले गए थे। बाद में वे जब लौटे तो उनका कोई सामान चोरी नहीं गया था। कई और देशों में भी समाज का नैतिक स्तर ऐसा ही है। जबकि हमारे यहां उत्तराखंड की आपदा के दौरान लोगों के कीमती सामान गायब करने की ढेरों घटनाएं हुर्इं। दूसरी जगहों पर भी मुसीबत के समय ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होती हैं। कई दंगों के पीछे तो लूटपाट करना और संपत्ति हड़पना ही कारण होता है। साधु-संत होने का दम भरने वाले भी अनेक लोग बेहिसाब संपत्ति जुटाने में लगे रहते हैं। हमारे समाज में बेईमानी एक परिघटना बन चुकी है। इससे निपटने के लिए कड़े और फिर ज्यादा कड़े कानून बनाने की मांग होती है। निश्चय ही कानूनी सख्ती होनी चाहिए, पर समाज का मिजाज बदलने के प्रयास भी तो होने चाहिए।

 

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